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RG KAR केस में बड़ा एक्शन! 3 IPS अफसर सस्पेंड, डॉक्टर रेप-मर्डर केस में रिश्वत, सबूत मिटाने और लीपापोती के गंभीर आरोप


RG KAR रेप-मर्डर केस में 3 IPS अफसर सस्पेंड, सबूत मिटाने और परिवार को चुप कराने के गंभीर आरोप।

कोलकाता के चर्चित आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप और मर्डर केस में पश्चिम बंगाल सरकार ने बड़ा प्रशासनिक एक्शन लेते हुए तीन वरिष्ठ IPS अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। पूर्व कोलकाता पुलिस कमिश्नर विनीत गोयल, पूर्व डीसी सेंट्रल इंदिरा मुखर्जी और पूर्व डीसी नॉर्थ अभिषेक गुप्ता पर जांच में गड़बड़ी, सबूतों से छेड़छाड़, पीड़ित परिवार को कथित तौर पर चुप कराने की कोशिश और पुलिस प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही के आरोप लगे हैं। लगभग दो साल पुराने इस मामले में यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब लगातार पुलिस की भूमिका पर सवाल उठ रहे थे और पूरे देश में न्याय की मांग तेज हो गई थी।

RG KAR केस में आखिर क्यों सस्पेंड किए गए तीनों IPS अधिकारी?

आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के रेप और मर्डर की घटना सामने आने के बाद से ही कोलकाता पुलिस की कार्यप्रणाली विवादों में रही थी। शुरुआती जांच के दौरान पुलिस की भूमिका पर कई गंभीर सवाल उठे थे। आरोप लगे कि पुलिस ने घटनास्थल को समय पर सील नहीं किया, बाहरी लोगों को मौके पर जाने दिया और कई महत्वपूर्ण सबूतों की सुरक्षा नहीं की गई।

राज्य सरकार की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक तीनों अधिकारियों पर प्रशासनिक प्रक्रिया में चूक, अधिकारों के गलत इस्तेमाल और केस हैंडलिंग में गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं। सबसे बड़ा आरोप यह भी है कि पीड़ित परिवार पर दबाव बनाने और उन्हें कथित तौर पर आर्थिक मदद के जरिए शांत कराने की कोशिश की गई थी।

सरकार ने साफ किया है कि यह सस्पेंशन सीबीआई जांच को प्रभावित नहीं करेगा। सीबीआई अपनी आपराधिक जांच जारी रखेगी जबकि राज्य सरकार प्रशासनिक जिम्मेदारियों और पुलिस अधिकारियों की भूमिका की अलग से जांच करेगी।

यह मामला देशभर में इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि महिला डॉक्टर की मौत के बाद मेडिकल समुदाय, जूनियर डॉक्टरों और आम नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया था। कोलकाता से लेकर दिल्ली तक डॉक्टरों के विरोध प्रदर्शन ने सरकार और पुलिस दोनों पर भारी दबाव बनाया था।

कौन हैं IPS विनीत गोयल, जिन पर सबसे ज्यादा उठे सवाल?

विनीत गोयल 1994 बैच के वरिष्ठ IPS अधिकारी हैं और उन्होंने 1 जनवरी 2022 को कोलकाता पुलिस कमिश्नर का पद संभाला था। आरजी कर केस के दौरान वही शहर के पुलिस प्रमुख थे। घटना के बाद से ही उनका नाम विवादों में रहा।

सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की संवेदनशील मामलों में पहचान गोपनीय रखने की गाइडलाइन के बावजूद सार्वजनिक रूप से पीड़िता का नाम लिया था। इस पर बाद में कानूनी विवाद खड़ा हुआ और उन्हें हाई कोर्ट में माफी भी मांगनी पड़ी।

14 अगस्त 2024 की रात जब महिला डॉक्टर के लिए राज्यभर में विरोध प्रदर्शन हो रहा था, उसी दौरान आरजी कर अस्पताल परिसर में हिंसा और तोड़फोड़ हुई थी। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि पुलिस वहां मौजूद होने के बावजूद भीड़ को रोकने में नाकाम रही। अस्पताल के इमरजेंसी विभाग और प्रदर्शन स्थल पर हमला हुआ, लेकिन पुलिस निष्क्रिय बनी रही।

इस घटना के बाद विनीत गोयल पर सवालों की बौछार शुरू हो गई थी। विपक्ष और डॉक्टर संगठनों ने उन्हें हटाने की मांग की थी। हालांकि तत्कालीन सरकार ने काफी समय तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

बाद में मामले में गिरफ्तार सिविक वॉलंटियर संजय रॉय ने भी कोर्ट में दावा किया था कि उसे फंसाया गया है और इसमें कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका रही है। उसके आरोपों के बाद मामला और ज्यादा संवेदनशील हो गया था।

वर्तमान में विनीत गोयल राज्य पुलिस की इंटेलिजेंस ब्रांच में डीजी स्तर की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, लेकिन अब उन्हें सस्पेंड कर दिया गया है।

IPS इंदिरा मुखर्जी पर क्या हैं आरोप?

इंदिरा मुखर्जी उस समय कोलकाता पुलिस में डीसी सेंट्रल के पद पर थीं। महिला डॉक्टर की बॉडी मिलने के बाद घटनास्थल से जुड़े कई वीडियो सामने आए थे, जिनमें सेमिनार हॉल के आसपास कई लोगों की आवाजाही दिखाई दी थी।

इंदिरा मुखर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि जहां शव मिला था वह हिस्सा पूरी तरह सुरक्षित था और किसी बाहरी व्यक्ति को अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। लेकिन बाद में सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने पुलिस के दावों पर सवाल खड़े कर दिए।

जूनियर डॉक्टरों और प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने घटनास्थल की सुरक्षा में भारी लापरवाही की। मेडिकल छात्रों ने सवाल उठाया कि आखिर शव मिलने के बाद भी इतने लोग मौके पर कैसे पहुंच गए और पुलिस उन्हें रोक क्यों नहीं सकी।

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फॉरेंसिक नियमों के मुताबिक किसी भी संवेदनशील अपराध स्थल को तुरंत सील किया जाना चाहिए ताकि सबूत सुरक्षित रह सकें। लेकिन इस मामले में लगातार आरोप लगते रहे कि घटनास्थल से छेड़छाड़ हुई और पुलिस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।

सोशल मीडिया पर इंदिरा मुखर्जी की भूमिका को लेकर सवाल उठने के बाद पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों पर केस भी दर्ज किए थे। इससे मामला और ज्यादा राजनीतिक और संवेदनशील बन गया था।

वर्तमान में इंदिरा मुखर्जी सीआईडी में स्पेशल सुपरिटेंडेंट के पद पर तैनात थीं, लेकिन अब सरकार ने उन्हें भी निलंबित कर दिया है।

अभिषेक गुप्ता पर क्यों गिरी गाज?

अभिषेक गुप्ता उस समय डीसी नॉर्थ थे और टाला थाना उनके अधिकार क्षेत्र में आता था। आरजी कर मेडिकल कॉलेज इसी इलाके में स्थित है। इसलिए शुरुआती जांच और सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी उनके दायरे में थी।

उन पर आरोप है कि घटना के बाद सेमिनार हॉल की स्थिति बदल गई थी और पुलिस ने मौके को ठीक से सुरक्षित नहीं रखा। इसके अलावा रेड और जांच के दौरान तोड़फोड़ और अव्यवस्था के आरोप भी लगे थे।

पीड़ित परिवार ने दावा किया था कि उनकी बेटी का अंतिम संस्कार बेहद जल्दबाजी में कराया गया। परिवार का कहना था कि उन्हें दूसरी पोस्टमार्टम जांच का मौका तक नहीं दिया गया। बाद में सीबीआई ने भी कोर्ट में कहा कि कोलकाता पुलिस की जल्दबाजी की वजह से परिवार की दूसरी ऑटोप्सी की मांग पूरी नहीं हो सकी।

सीबीआई जांच के दौरान टाला थाने के तत्कालीन ओसी अभिजीत मंडल को गिरफ्तार किया गया था। उन पर सबूत मिटाने और जांच में लापरवाही के आरोप लगे थे। इसी दौरान अभिषेक गुप्ता की भूमिका भी जांच के दायरे में आई थी।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक शुरुआती जांच के दौरान कई फैसले अत्यधिक जल्दबाजी में लिए गए थे और इसी वजह से पुलिस अधिकारियों की भूमिका अब गंभीर जांच के घेरे में आ गई है।

पूरे देश में गूंजा था RG KAR केस

आरजी कर मेडिकल कॉलेज की महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे देश को झकझोर दिया था। डॉक्टरों ने अस्पतालों में काम बंद कर विरोध प्रदर्शन किए थे। सोशल मीडिया पर भी न्याय की मांग तेज हो गई थी।

इस केस ने महिला सुरक्षा, मेडिकल संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस जांच की पारदर्शिता को लेकर बड़े सवाल खड़े किए थे। खास तौर पर कोलकाता पुलिस की शुरुआती जांच पर लगातार सवाल उठते रहे।

डॉक्टर संगठनों का आरोप था कि पुलिस शुरुआत से ही मामले को दबाने की कोशिश कर रही थी। कई प्रदर्शनकारियों ने इसे “सबूत मिटाने की साजिश” तक बताया था। हालांकि पुलिस लगातार इन आरोपों से इनकार करती रही।

अब तीन वरिष्ठ IPS अधिकारियों के सस्पेंशन के बाद यह मामला फिर से राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है। राजनीतिक गलियारों में भी इस कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

सस्पेंशन के बाद आगे क्या होगा?

सरकार ने साफ कर दिया है कि तीनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच चलाई जाएगी। दूसरी तरफ सीबीआई की आपराधिक जांच पहले की तरह जारी रहेगी। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस केस में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जांच में सबूत मिटाने, परिवार पर दबाव बनाने या जांच को प्रभावित करने के आरोप साबित होते हैं तो संबंधित अधिकारियों पर और भी सख्त कार्रवाई हो सकती है।

इस केस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हाई प्रोफाइल मामलों में पुलिस की जवाबदेही कैसे तय होगी और क्या पीड़ित परिवारों को समय पर निष्पक्ष न्याय मिल पाएगा।

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