AAP में ‘ब्लू-आई बॉय’ से बागी तक… क्यों टूटा राघव चड्ढा का केजरीवाल से रिश्ता और क्यों थामा BJP का हाथ?




राघव चड्ढा ने AAP छोड़ BJP जॉइन की, केजरीवाल-मान से टकराव और पार्टी लाइन से अलग चलने की पूरी अंदरूनी कहानी


AAP से BJP तक राघव चड्ढा का सियासी सफर

भारतीय राजनीति में अचानक हुए बड़े घटनाक्रम ने सबको चौंका दिया, जब आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे Raghav Chadha ने पार्टी से दूरी बनाते हुए भारतीय जनता पार्टी का दामन थामने का ऐलान कर दिया। कभी Arvind Kejriwal के सबसे करीबी और भरोसेमंद माने जाने वाले राघव चड्ढा का यह कदम न सिर्फ AAP बल्कि पूरे राजनीतिक गलियारे में हलचल मचाने वाला साबित हुआ। उनके साथ अन्य सांसदों की मुलाकात और बड़े स्तर पर दल बदल की संभावनाओं ने इस घटनाक्रम को और भी बड़ा बना दिया है।

‘ब्लू-आई बॉय’ से दूरी की शुरुआत

राघव चड्ढा को लंबे समय तक अरविंद केजरीवाल का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता था। पार्टी के भीतर उन्हें ‘ब्लू-आई बॉय’ कहा जाता था, जो सीधे शीर्ष नेतृत्व से संवाद रखते थे। लेकिन यही करीबी रिश्ता धीरे-धीरे दूरी में बदल गया। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, समय के साथ राघव का काम करने का तरीका और स्वतंत्र राजनीतिक छवि बनाने की कोशिश नेतृत्व को खटकने लगी थी।

पंजाब राजनीति में टकराव की कहानी

2022 में पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद राघव चड्ढा का कद और बढ़ गया। उस दौरान उन्हें अनौपचारिक तौर पर ‘डि-फैक्टो सीएम’ तक कहा जाने लगा। लेकिन यहीं से उनके और Bhagwant Mann के बीच टकराव की खबरें सामने आने लगीं।

बताया जाता है कि राघव चड्ढा अधिकारियों की बैठकों में हस्तक्षेप करते थे और कई प्रशासनिक फैसलों में सक्रिय भूमिका निभाते थे। इससे भगवंत मान के अधिकार क्षेत्र को चुनौती मिलने लगी। हालांकि दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कभी इस विवाद को स्वीकार नहीं किया, लेकिन अंदरखाने यह खींचतान लगातार बढ़ती रही।

केजरीवाल के सामने उठी शिकायतें

पार्टी सूत्रों के अनुसार, भगवंत मान ने कई बार अरविंद केजरीवाल के सामने राघव चड्ढा के हस्तक्षेप को लेकर नाराजगी जाहिर की थी। बावजूद इसके, लंबे समय तक केजरीवाल का समर्थन राघव के साथ बना रहा। यही कारण था कि यह विवाद खुलकर सामने नहीं आया, लेकिन इससे पार्टी के भीतर गुटबाजी की स्थिति जरूर पैदा हो गई।

गिरफ्तारी के दौरान बढ़ी दूरियां

टर्निंग पॉइंट तब आया जब अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान पार्टी ने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए। इस दौरान भगवंत मान अपने मंत्रियों और विधायकों के साथ दिल्ली पहुंचे और खुलकर प्रदर्शन किया, लेकिन राघव चड्ढा इन कार्यक्रमों से दूरी बनाए रहे।

पार्टी को उम्मीद थी कि राघव इस मुश्किल समय में मजबूती से साथ खड़े होंगे, लेकिन उनकी गैरमौजूदगी ने नेतृत्व को निराश किया। यही वह दौर था जब राघव और पार्टी के बीच दूरी साफ तौर पर दिखने लगी।

पंजाब से दिल्ली तक सीमित हुआ दायरा

केजरीवाल के जेल से बाहर आने के बाद राघव चड्ढा को धीरे-धीरे पंजाब की राजनीति से दूर कर दिया गया। उनका दायरा सीमित कर दिया गया और उन्हें पार्टी के अहम फैसलों से अलग रखा जाने लगा। इसके साथ ही उनकी केंद्रीय नेतृत्व से भी दूरी बढ़ती चली गई।

पार्टी लाइन से अलग चलने का आरोप

राज्यसभा में राघव चड्ढा की सक्रियता भी विवाद का कारण बनी। उन्होंने मिडिल क्लास, टैक्स और गिग वर्कर्स जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाना शुरू किया, जबकि पार्टी चाहती थी कि वे तय एजेंडे पर बोलें। इससे यह संदेश गया कि राघव पार्टी लाइन से हटकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

इसी के चलते उन्हें राज्यसभा में AAP के डिप्टी लीडर पद से हटा दिया गया। यह कदम उनके और पार्टी के बीच बढ़ती दूरी का सबसे बड़ा संकेत माना गया।

भगवंत मान की खुली नाराजगी

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब भगवंत मान ने सार्वजनिक तौर पर राघव चड्ढा को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने यहां तक कह दिया कि राघव ‘कॉम्प्रोमाइज्ड’ हैं। यह बयान साफ तौर पर दर्शाता है कि पार्टी के अंदर अब उनके लिए जगह सीमित होती जा रही थी।

बीजेपी में शामिल होने का ऐलान

इन सभी घटनाओं के बीच राघव चड्ढा ने बड़ा राजनीतिक कदम उठाते हुए बीजेपी में शामिल होने का ऐलान कर दिया। उन्होंने दावा किया कि आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों का एक बड़ा हिस्सा भी उनके साथ बीजेपी का रुख करेगा। इस बयान ने AAP के भीतर हलचल मचा दी है।

AAP की प्रतिक्रिया और ‘गद्दार’ का आरोप

राघव चड्ढा के इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी ने उन्हें ‘गद्दार’ करार दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि राघव ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के चलते पार्टी की विचारधारा से समझौता किया है।

बदलती राजनीति और बड़ा संदेश

राघव चड्ढा का यह कदम सिर्फ एक नेता का दल बदल नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी के अंदर चल रही खींचतान और बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी है। यह घटनाक्रम आने वाले समय में पार्टी की रणनीति और नेतृत्व पर भी असर डाल सकता है।

इस पूरी कहानी ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति में रिश्ते और समीकरण कितनी तेजी से बदलते हैं, और कैसे एक समय का सबसे भरोसेमंद चेहरा अचानक सबसे बड़ा विरोधी बन जाता है।

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