जबलपुर में ट्रेनों में वसूली करने वाले 60 से ज्यादा नकली किन्नर पकड़े गए। QR कोड से भी लेते थे पैसे।
जबलपुर और आसपास के रेलवे स्टेशनों पर ट्रेनों में यात्रियों से पैसे मांगने वाले कई किन्नर असली नहीं बल्कि पुरुष निकले। रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स ने पिछले छह महीनों में 60 से अधिक ऐसे लोगों को पकड़ा है, जो किन्नर बनकर यात्रियों से अवैध वसूली कर रहे थे। आरपीएफ की जांच में खुलासा हुआ कि ये लोग गैंग बनाकर ट्रेन और स्टेशन पर सक्रिय थे और कई यात्री इन्हें असली किन्नर समझकर पैसे दे देते थे। कुछ आरोपी डिजिटल पेमेंट के लिए QR कोड तक रखते थे।
ट्रेनों में स्पेशल चेकिंग के दौरान हुआ बड़ा खुलासा
पश्चिम मध्य रेलवे मुख्यालय जबलपुर में लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि ट्रेनों में किन्नरों के नाम पर यात्रियों को परेशान किया जा रहा है। कई यात्रियों ने आरोप लगाया था कि उनसे जबरन पैसे मांगे जाते हैं और मना करने पर अभद्र व्यवहार किया जाता है। शिकायतों के बाद रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स ने 3 जून को विशेष जांच अभियान चलाया।
इस दौरान अलग-अलग ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर चेकिंग की गई। अभियान के दौरान तीन संदिग्ध किन्नरों को पकड़ा गया। पूछताछ में सामने आया कि तीनों जैविक रूप से पुरुष हैं और केवल किन्नर का वेश धारण कर यात्रियों से पैसे वसूलते थे। आरपीएफ अधिकारियों के मुताबिक ये लोग लंबे समय से इस काम में शामिल थे और अलग-अलग ट्रेनों में घूमकर वसूली करते थे।
स्टेशन पहुंचने से पहले बदल लेते थे कपड़े
पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि वे घर से सामान्य कपड़ों में निकलते थे। रेलवे स्टेशन के पास पहुंचने के बाद रास्ते में ही कपड़े बदल लेते थे। सलवार-सूट या साड़ी पहनने के साथ मेकअप करते थे और माथे पर सिंदूर भी लगाते थे ताकि कोई शक न करे।
आरपीएफ के अनुसार आरोपियों ने अपने बोलने और चलने के तरीके को भी पूरी तरह बदल रखा था। यही वजह थी कि यात्री आसानी से इन्हें असली किन्नर समझ लेते थे। आरोपी ट्रेनों के जनरल और स्लीपर कोच में ज्यादा सक्रिय रहते थे, जहां यात्रियों की संख्या अधिक होती है।
QR कोड से भी लेते थे पैसे, महीने में 60 हजार तक कमाई
पकड़े गए आरोपियों के नाम आशी, माही और तरन्नुम बताए गए हैं। हालांकि इनके असली नाम अलग हैं। ये तीनों जबलपुर के गायत्रीनगर इलाके में किराए के मकान में रहते थे और रोजाना ट्रेनों में जाकर पैसे मांगने का काम करते थे।
मीडिया से बातचीत में एक आरोपी ने बताया कि उसे नौकरी नहीं मिल रही थी, जिसके बाद उसने यह रास्ता चुना। आरोपियों का दावा है कि वे हर महीने 50 से 60 हजार रुपए तक कमा लेते थे। कई यात्री कैश नहीं होने की बात कहते थे, इसलिए उन्होंने डिजिटल पेमेंट के लिए QR कोड भी बनवा रखा था।
आरपीएफ अधिकारियों के मुताबिक आरोपी उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले हैं। जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर और इटारसी जैसे बड़े रेलवे जंक्शनों पर इनका नेटवर्क सक्रिय था। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस गैंग में और कितने लोग शामिल हैं और क्या दूसरे शहरों में भी इसी तरह का नेटवर्क चल रहा है।


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