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गुजरात से दिल्ली तक 25 साल का सत्ता सफर, PM नरेंद्र मोदी की राजनीति ने कैसे बदली करवट; जानिए पूरी कहानी


नरेंद्र मोदी के सत्ता में 25 साल पूरे, गुजरात के मुख्यमंत्री से लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने तक जानिए पूरा राजनीतिक सफर।

नरेंद्र मोदी के सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के 25 साल पूरे हो गए हैं। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने करीब 13 साल तक राज्य की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की और 22 मई 2014 को देश के प्रधानमंत्री बने। इसके बाद 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा ने उनके नेतृत्व में जीत दर्ज की। गुजरात की राजनीति से राष्ट्रीय सत्ता तक का यह सफर कई राजनीतिक उतार-चढ़ावों से होकर गुजरा।

7 अक्टूबर 2001 से शुरू हुआ सत्ता के शीर्ष तक का सफर

भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र मोदी को सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए 25 साल पूरे हो गए हैं। 7 अक्टूबर 2001 को उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था। इसके करीब 13 साल बाद वह देश के प्रधानमंत्री बने। इस दौरान वह लगातार सत्ता के केंद्र में बने रहे। किसी राजनेता के लिए इतने लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पर बने रहना एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना जाता है।

नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर की खास बात यह रही कि गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई और बाद में राष्ट्रीय राजनीति में भी भाजपा के सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे। उनके लंबे राजनीतिक सफर के पीछे उनके समर्थक उनके राजनीतिक नेतृत्व, जमीनी पकड़ और संगठनात्मक क्षमता को प्रमुख वजहों में गिनाते हैं।

हालांकि इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रहना अपने आप में एक अलग राजनीतिक घटना है। आम तौर पर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं को जनता के बीच नाराजगी और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। नरेंद्र मोदी के मामले में भी राजनीतिक विरोध और विवाद रहे, लेकिन इसके बावजूद वह लगातार सत्ता के शीर्ष पर बने रहे।

गुजरात की राजनीति में उस समय था अस्थिरता का दौर

जब भाजपा संगठन के राष्ट्रीय महामंत्री पद से नरेंद्र मोदी को हटाकर गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया, तब यह फैसला कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। उस समय गुजरात की राजनीति लंबे समय से अस्थिरता के दौर से गुजर रही थी। शंकर सिंह वाघेला और केशूभाई पटेल भी राज्य को राजनीतिक स्थिरता देने में पूरी तरह सफल नहीं हो सके थे।

इससे पहले कांग्रेस के शासनकाल में भी गुजरात को राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ा था। 1974 में जब चिमन भाई पटेल मुख्यमंत्री थे, तब राज्य में बड़ा छात्र आंदोलन हुआ था। इसके बाद गुजरात में कई सरकारें आईं, लेकिन लंबे समय तक स्थिरता कायम नहीं रह सकी।

चिमन भाई पटेल कुल 207 दिन तक मुख्यमंत्री रहे और 9 फरवरी 1974 को गुजरात में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। इसके बाद कांग्रेस (ओ) के बाबू भाई पटेल मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका कार्यकाल भी 268 दिन ही रहा।

गुजरात में बार-बार बदली सरकारें

इसके बाद गुजरात में एक बार फिर 287 दिनों तक राष्ट्रपति शासन रहा। 24 दिसंबर 1976 को कांग्रेस (इंदिरा) के माधव सिंह सोलंकी मुख्यमंत्री बने। हालांकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया। 11 अप्रैल 1977 को बाबू भाई पटेल ने मुख्यमंत्री पद संभाला।

केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार वापस आने के बाद बाबू भाई पटेल की सरकार भी चली गई और गुजरात में 111 दिनों तक राष्ट्रपति शासन रहा। इसके बाद छठी विधानसभा में कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की और माधव सिंह सोलंकी फिर मुख्यमंत्री बने।

अगली विधानसभा में भी कांग्रेस की वापसी हुई और अमर सिंह मुख्यमंत्री बने। करीब 4 साल 157 दिन बाद केंद्र की राजीव गांधी सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया और माधव सिंह सोलंकी को फिर मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि इस बार उनका कार्यकाल सिर्फ 84 दिनों का रहा और इसके बाद विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया।

राष्ट्रपति शासन और बदलते राजनीतिक समीकरण

आठवीं विधानसभा में जनता दल ने सरकार बनाई और चिमन भाई पटेल मुख्यमंत्री बने। हालांकि वह भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। उनकी सरकार तीन साल 350 दिनों के भीतर अल्पमत में आ गई।

इसके बाद 17 फरवरी 1994 को कांग्रेस की ओर से छबील दास मेहता गुजरात के मुख्यमंत्री बने। फिर 1995 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सत्ता हासिल की और केशूभाई पटेल मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल 221 दिनों तक रहा।

इसके बाद भाजपा ने सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी। वह 334 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद गुजरात एक बार फिर राष्ट्रपति शासन के दौर में चला गया।

34 दिनों के बाद राष्ट्रीय जनता पार्टी के शंकर सिंह वाघेला को मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि वह भी ज्यादा समय तक सरकार नहीं चला सके। एक वर्ष चार दिन बाद इसी पार्टी के दिलीप पारीख को मुख्यमंत्री बनाया गया। उनका कार्यकाल भी केवल 128 दिनों का रहा।

1998 में फिर सत्ता में आई भाजपा

गुजरात विधानसभा के मध्यावधि चुनाव 1998 में हुए। इन चुनावों में भाजपा को जीत मिली और 4 मार्च 1998 को केशूभाई पटेल ने एक बार फिर गुजरात की कमान संभाली।

केशूभाई पटेल के कार्यकाल के दौरान 26 जनवरी 2001 को कच्छ में विनाशकारी भूकंप आया। इस प्राकृतिक आपदा से गुजरात बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसके बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और 7 अक्टूबर 2001 को केशूभाई पटेल की विदाई हो गई।

इसी दिन नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। उस समय वह हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। संगठन से जुड़े एक नेता के रूप में काम कर रहे नरेंद्र मोदी को अचानक गुजरात की सत्ता की जिम्मेदारी मिलना उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

गुजरात से शुरू हुई नरेंद्र मोदी की नई राजनीतिक पारी

7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने राज्य की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। वह 22 मई 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति का रुख किया और 22 मई 2014 को देश के प्रधानमंत्री बने।

इस तरह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुआ उनका सत्ता का सफर राष्ट्रीय सत्ता के शीर्ष तक पहुंच गया। लंबे समय तक गुजरात की सत्ता में रहने के दौरान उन्होंने राज्य में विकास, उद्योग और उद्यमशीलता को अपनी राजनीति का प्रमुख हिस्सा बनाया।

गुजरात को निवेश और उद्योग के लिए आकर्षक राज्य के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयासों में वाइब्रेंट गुजरात की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके नेतृत्व में राज्य की राजनीति ने एक अलग दिशा ली और भाजपा ने गुजरात में अपनी स्थिति मजबूत की।

गुजरात की राजनीति में जातीय समीकरणों का लंबा इतिहास

गुजरात नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। जिस राज्य में अलग-अलग दौर में जातीय और राजनीतिक समीकरणों के आधार पर प्रयोग हुए, उसी गुजरात में नरेंद्र मोदी ने भाजपा की लंबे समय तक सत्ता कायम रखने वाली राजनीतिक व्यवस्था तैयार की।

गुजरात की राजनीति में माधव सिंह सोलंकी से लेकर झीनाभाई दर्जी तक कई नेताओं की भूमिका रही। माधव सिंह सोलंकी ने गुजरात की राजनीति में KHAM यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और दलित वोटों पर आधारित राजनीतिक समीकरण को आगे बढ़ाया।

इस राजनीतिक रणनीति के कारण गुजरात की राजनीति में बनिया, पटेल और ब्राह्मण समुदायों की भूमिका पहले की तुलना में पीछे चली गई। 1980 और 1985 के विधानसभा चुनावों में माधव सिंह सोलंकी को इस रणनीति का बड़ा राजनीतिक लाभ मिला। वह तीन बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने और बाद में नरसिंह राव सरकार में विदेश मंत्री भी रहे।

KHAM राजनीति के पीछे झीनाभाई दर्जी की भूमिका

KHAM राजनीति के प्रमुख सूत्रधारों में झीनाभाई दर्जी का नाम लिया जाता है। वह गांधीवादी नेता थे और अछूतोद्धार के काम से जुड़े रहे। गुजरात में कांग्रेस को मजबूत करने में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

उन्होंने ही माधव सिंह सोलंकी को KHAM राजनीति को अपनाने के लिए प्रेरित किया। इस राजनीतिक समीकरण का उद्देश्य गुजरात में अलग-अलग सामाजिक समूहों को एक साथ जोड़कर कांग्रेस के लिए मजबूत वोट आधार तैयार करना था।

गुजरात के गठन से पहले यह क्षेत्र सौराष्ट्र राज्य और बॉम्बे प्रांत का हिस्सा था। भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग के बीच एक जून 1960 को गुजरात और सौराष्ट्र को मिलाकर गुजरात राज्य बनाया गया।

उस समय सौराष्ट्र की राजधानी राजकोट थी। गुजरात का क्षेत्र आर्थिक रूप से समृद्ध माना जाता था। बॉम्बे-वडोदरा मार्ग के आसपास का क्षेत्र उद्योग, कृषि और व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण था।

शुरुआत में अहमदाबाद को गुजरात की राजधानी बनाया गया। बाद में 1965 में अहमदाबाद से करीब 40 किलोमीटर दूर गांधीनगर बसाया गया और उसे गुजरात की राजधानी बनाया गया।

पटेल और बनिया समुदायों का व्यापार में प्रभाव

गुजरात में पटेल समुदाय की व्यापार में मजबूत पकड़ थी। बनिया समुदाय भी कारोबार में आगे था, जबकि ब्राह्मणों की बड़ी भूमिका नौकरशाही में थी। दूसरी ओर काठियावाड़ और सौराष्ट्र के हरिजन तथा गिरिजन समुदाय आर्थिक रूप से पिछड़े हुए थे।

इसी सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के बीच झीनाभाई दर्जी की सलाह पर माधव सिंह सोलंकी और अमर सिंह जैसे क्षत्रिय नेताओं ने KHAM राजनीतिक समीकरण को आगे बढ़ाया।

हालांकि इस राजनीतिक बदलाव के साथ गुजरात में जातीय और सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ा। राज्य में दंगों की घटनाएं हुईं और आर्थिक गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ा। अहमदाबाद के कारखाने बंद होने लगे। सूरत का साड़ी उद्योग और हीरा साफ करने का कारोबार भी प्रभावित हुआ। प्रशासनिक भ्रष्टाचार को लेकर भी सवाल उठे।

इसी पृष्ठभूमि में गुजरात को एक मजबूत राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत महसूस हुई और 2001 में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य की राजनीति ने नया मोड़ लिया।

मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद गोधरा कांड

नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद गुजरात में एक ऐसी घटना हुई, जिसने राज्य की राजनीति और देश की राजनीति दोनों को गहराई से प्रभावित किया।

गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आगजनी की घटना के बाद गुजरात के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। ट्रेन में अयोध्या से लौट रहे हिंदू तीर्थयात्री सवार थे। ट्रेन के एक कोच में आग लगने से 58 तीर्थयात्रियों की मौत हुई।

इसके बाद गुजरात में हिंदू-मुस्लिम तनाव बढ़ गया और मार्च में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। हिंसा के दौरान हत्या, मारपीट और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। इस हिंसा का सबसे ज्यादा असर मुस्लिम समुदाय पर पड़ा।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दंगों में 790 मुस्लिम और 294 हिंदू मारे गए। राज्य सरकार पर हिंसा को तत्काल रोक पाने में विफल रहने को लेकर सवाल उठे।

हिंसा के बाद विकास और उद्यमशीलता पर जोर

गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने विकास और उद्यमशीलता पर जोर दिया। राज्य की अर्थव्यवस्था, उद्योग और निवेश को आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया गया।

इसी दौर में गुजरात को निवेश के प्रमुख केंद्र के रूप में पेश करने की कोशिश तेज हुई। वाइब्रेंट गुजरात जैसे प्रयासों के जरिए राज्य को उद्योग और निवेश के लिए एक अलग पहचान देने पर जोर दिया गया।

समय के साथ गुजरात की राजनीति में भाजपा की पकड़ मजबूत होती गई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने राज्य में अपनी राजनीतिक स्थिति बनाए रखी और गुजरात उनकी राष्ट्रीय राजनीति की नींव बना।

2013 में राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ी नरेंद्र मोदी की भूमिका

गुजरात में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के बाद नरेंद्र मोदी की भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में लगातार बढ़ती गई। 2013 में भाजपा ने उन्हें अगले लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी के प्रमुख चेहरे के रूप में आगे किया।

लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। इसके बाद 22 मई 2014 को नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। इस तरह 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुआ उनका सत्ता का सफर करीब 13 साल बाद देश की सर्वोच्च निर्वाचित कार्यपालिका के नेतृत्व तक पहुंच गया।

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेंद्र मोदी भाजपा के सबसे प्रमुख राजनीतिक चेहरों में बने रहे। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उनके नेतृत्व में दोबारा बड़ी जीत हासिल की।

इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ चुनाव मैदान में उतरी और जीत दर्ज की। इस तरह नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।

गुजरात के बाद देश की राजनीति में भी कायम रही पकड़

नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर में गुजरात का मुख्यमंत्री काल निर्णायक रहा। राज्य की राजनीति में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का नेतृत्व किया।

उनकी राजनीति में संगठन, चुनावी रणनीति, जमीनी संपर्क और विकास का मुद्दा प्रमुख रहा। गुजरात मॉडल को राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा मिली और 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल कर केंद्र में सरकार बनाई।

इसके बाद 2019 में भाजपा ने अपनी लोकसभा सीटों की संख्या और मजबूत की। 2024 में भी नरेंद्र मोदी पार्टी के प्रमुख चेहरे रहे और चुनाव के बाद लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।

उनके लंबे राजनीतिक सफर में कई राजनीतिक विवाद और चुनौतियां भी सामने आईं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके शुरुआती दौर में हुई सांप्रदायिक हिंसा उनके राजनीतिक जीवन का सबसे गंभीर और विवादित अध्याय रही। इसके बावजूद वह गुजरात में लंबे समय तक सत्ता में रहे और बाद में राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल हुए।

25 साल की सत्ता में गुजरात से प्रधानमंत्री पद तक पहुंच

7 अक्टूबर 2001 से शुरू हुआ नरेंद्र मोदी का सत्ता का शीर्ष पर सफर अब 25 साल का हो चुका है। इस अवधि में करीब 13 साल उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बिताए और 22 मई 2014 से वह देश के प्रधानमंत्री हैं।

गुजरात की अस्थिर राजनीति, बार-बार बदलती सरकारें, राष्ट्रपति शासन, जातीय समीकरण, आर्थिक चुनौतियां और 2002 की सांप्रदायिक हिंसा जैसे दौर से गुजरने के बाद नरेंद्र मोदी ने राज्य की राजनीति में अपनी जगह बनाई। इसके बाद भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रमुख चेहरा बनाया।

2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी भाजपा के केंद्रीय चेहरे रहे। इस तरह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुआ राजनीतिक सफर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा और वह लगातार सत्ता के शीर्ष पर बने रहे।

नरेंद्र मोदी के 25 साल के सत्ता सफर को भारतीय राजनीति में एक लंबे और महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्याय के रूप में देखा जाता है। गुजरात से शुरू हुई उनकी राजनीतिक यात्रा ने उन्हें राष्ट्रीय सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने तक जारी रही।


साभार: मीडिया रिपोर्ट्स 


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