लखनऊ मेयर सुषमा खर्कवाल के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार हाई कोर्ट ने सीज किए, जानें पूरा विवाद और कोर्ट का सख्त आदेश।
लखनऊ नगर निगम की राजनीति में उस वक्त बड़ा भूचाल आ गया जब इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने मेयर सुषमा खर्कवाल के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज करने का सख्त आदेश जारी कर दिया। अदालत ने यह कार्रवाई वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से निर्वाचित घोषित किए गए पार्षद ललित तिवारी को पांच महीने बाद भी शपथ न दिलाए जाने पर की है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब तक ललित तिवारी को पार्षद पद की शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर के अधिकार बहाल नहीं किए जाएंगे। इस फैसले के बाद नगर निगम के कई बड़े प्रशासनिक और वित्तीय फैसलों पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
पांच महीने तक नहीं दिलाई गई शपथ, कोर्ट ने माना आदेश की अवहेलना
पूरा मामला वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से जुड़ा हुआ है। यहां पार्षद चुनाव को लेकर विवाद अदालत तक पहुंचा था। चुनाव न्यायाधिकरण ने बीते साल 19 दिसंबर को बड़ा फैसला सुनाते हुए तत्कालीन पार्षद प्रदीप शुक्ला का निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया था। साथ ही हाई कोर्ट की अवध बार एसोसिएशन के महामंत्री ललित तिवारी को निर्वाचित पार्षद घोषित किया गया था।
अदालत के आदेश के बाद उम्मीद थी कि नगर निगम प्रशासन जल्द ही ललित तिवारी को पार्षद पद की शपथ दिला देगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। करीब पांच महीने गुजर जाने के बाद भी उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई। इसके बाद मामला दोबारा हाई कोर्ट पहुंचा, जहां ललित तिवारी की ओर से कहा गया कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद नगर निगम और मेयर कार्यालय ने जानबूझकर आदेश का पालन नहीं किया।
याचिका में यह भी कहा गया कि यह सिर्फ एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं बल्कि न्यायालय की अवमानना जैसा मामला है। अदालत ने इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए नगर निगम प्रशासन से जवाब मांगा।
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
जानकारी के मुताबिक मेयर पक्ष ने इस मामले में राहत पाने के लिए पहले हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था। नगर निगम की ओर से दलील दी गई कि चुनाव न्यायाधिकरण के फैसले के खिलाफ प्रथम अपील लंबित है और यदि बाद में अपील मंजूर हो जाती है तो विधिक स्थिति जटिल हो सकती है।
हालांकि अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी आदेश पर रोक नहीं लगती, तब तक उसका पालन करना अनिवार्य होता है। केवल अपील लंबित होने के आधार पर आदेश को लागू न करना कानून की भावना के खिलाफ माना जाएगा।
सूत्रों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से भी कोई राहत न मिलने के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि नगर निगम प्रशासन को अदालत के आदेश का पालन करना होगा। इसके बावजूद शपथ ग्रहण नहीं कराया गया, जिस पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की बेंच का सख्त आदेश
मामले की सुनवाई जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने की। अदालत ने सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में कहा कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि स्थानीय निकाय, नगर निगम और जनप्रतिनिधि भी कानून से ऊपर नहीं हैं। अगर अदालत का आदेश जारी हुआ है तो उसका पालन हर हाल में किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए न्यायिक आदेशों का सम्मान जरूरी है।
इसी दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि पांच महीने बीत जाने के बावजूद आदेश का पालन न होना बेहद गंभीर मामला है। उन्होंने अदालत से सख्त कार्रवाई की मांग की।
सुनवाई के बाद अदालत ने मेयर सुषमा खर्कवाल के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज करने का आदेश दे दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश तब तक प्रभावी रहेगा जब तक ललित तिवारी को विधिवत शपथ नहीं दिलाई जाती।
नगर निगम के कामकाज पर पड़ सकता है बड़ा असर
हाई कोर्ट के इस फैसले का सीधा असर लखनऊ नगर निगम के प्रशासनिक ढांचे पर पड़ सकता है। मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज होने के बाद कई अहम फाइलों की मंजूरी रुक सकती है।
नगर निगम में बजट स्वीकृति, विकास कार्यों की अनुमति, भुगतान प्रक्रिया, नई परियोजनाओं की मंजूरी और प्रशासनिक निर्णयों पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। अधिकारियों के बीच भी इस फैसले के बाद हलचल बढ़ गई है।
राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सुषमा खर्कवाल भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता हैं और मई 2023 से लखनऊ की मेयर पद पर कार्यरत हैं। ऐसे में हाई कोर्ट का यह आदेश राजनीतिक रूप से भी बड़ा झटका माना जा रहा है।
बीजेपी के लिए भी बढ़ी राजनीतिक मुश्किलें
लखनऊ की मेयर होने के साथ-साथ सुषमा खर्कवाल बीजेपी का बड़ा चेहरा मानी जाती हैं। ऐसे में विपक्ष ने इस मुद्दे पर भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि अदालत के आदेशों का पालन नहीं किया जाएगा तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में और ज्यादा तूल पकड़ सकता है। क्योंकि यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं बल्कि न्यायपालिका बनाम स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली से भी जुड़ा मुद्दा बन गया है।
उधर भाजपा नेताओं की ओर से फिलहाल इस मामले पर ज्यादा खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। हालांकि पार्टी के अंदर भी इस फैसले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
कौन हैं ललित तिवारी जिनकी वजह से हुआ पूरा विवाद
ललित तिवारी अवध बार एसोसिएशन के महामंत्री हैं और लंबे समय से कानूनी और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से पार्षद चुनाव में हार के बाद उन्होंने चुनाव परिणाम को चुनौती दी थी।
उन्होंने चुनाव न्यायाधिकरण में याचिका दाखिल कर चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी और अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। लंबी सुनवाई के बाद न्यायाधिकरण ने प्रदीप शुक्ला का निर्वाचन निरस्त करते हुए ललित तिवारी को निर्वाचित घोषित कर दिया था।
इसके बाद से ही यह मामला लगातार चर्चा में बना हुआ था। लेकिन शपथ ग्रहण में देरी होने के बाद विवाद और ज्यादा बढ़ गया और आखिरकार मामला हाई कोर्ट की सख्त कार्रवाई तक पहुंच गया।
अब आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि नगर निगम प्रशासन और मेयर कार्यालय अदालत के आदेश का पालन कब तक करते हैं। यदि जल्द ही ललित तिवारी को शपथ दिला दी जाती है तो मेयर के अधिकार बहाल हो सकते हैं।
हालांकि यदि आदेश के पालन में और देरी होती है तो मामला और गंभीर हो सकता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत भविष्य में अवमानना की कार्रवाई पर भी विचार कर सकती है।
फिलहाल हाई कोर्ट के इस आदेश ने लखनऊ नगर निगम की राजनीति और प्रशासन दोनों में हलचल मचा दी है। शहर की सियासत में यह मामला अब बड़ा मुद्दा बन चुका है और आने वाले दिनों में इस पर और बड़े घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।


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