गुलमर्ग गोंडोला हादसे के बाद जानिए रोपवे कैसे काम करता है, कितनी सुरक्षित होती है केबल कार और क्यों रुक जाती है हवा में।

जम्मू-कश्मीर के मशहूर गुलमर्ग गोंडोला रोपवे में आई तकनीकी खराबी ने सोमवार को सैकड़ों पर्यटकों की सांसें रोक दीं। एशिया के सबसे ऊंचे और दुनिया के सबसे लंबे रोपवे सिस्टम में अचानक खराबी आने से करीब 300 लोग हवा में लटके केबिनों में फंस गए। राहत की बात यह रही कि प्रशासन और रेस्क्यू टीम ने सभी यात्रियों को सुरक्षित निकाल लिया। लेकिन इस घटना के बाद हर किसी के मन में यही सवाल उठने लगा कि आखिर हजारों फीट ऊपर हवा में चलने वाली Ropeway या Gondola Cable Car कैसे काम करती है, इतनी भारी केबिनों को कौन खींचता है और अगर बिजली चली जाए तो यात्रियों की जान कैसे बचाई जाती है।

आखिर कैसे चलती है हजारों फीट ऊपर Ropeway?

रोपवे सिस्टम देखने में भले बेहद साधारण लगे, लेकिन इसके पीछे हाई लेवल मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग काम करती है। किसी भी Ropeway System का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी मोटी स्टील केबल होती है। यही केबल पूरे सिस्टम की जान मानी जाती है। स्टेशन पर बड़े-बड़े ड्राइविंग व्हील यानी पुली लगाए जाते हैं जिन्हें भारी इलेक्ट्रिक मोटर घुमाती है।

जब मोटर चालू होती है तो यह पुली स्टील की केबल को लगातार खींचती रहती है। यही घूमती हुई केबल ऊपर हवा में लटके केबिनों को आगे बढ़ाती है। हर केबिन इस केबल से बेहद मजबूत ग्रिप के जरिए जुड़ा होता है ताकि वह ऊंचाई पर भी सुरक्षित बना रहे। यही वजह है कि रोपवे पहाड़ों, घाटियों और बर्फीले इलाकों में आसानी से लंबी दूरी तय कर पाता है।

गुलमर्ग गोंडोला जैसे बड़े सिस्टम में हजारों मीटर लंबी स्टील वायर का इस्तेमाल किया जाता है जो कई टन वजन उठाने में सक्षम होती है। इन केबलों को विशेष मिश्र धातु वाले स्टील से बनाया जाता है ताकि वे बर्फ, बारिश, तेज हवाओं और अत्यधिक ठंड का सामना कर सकें।

स्टेशन पर पहुंचते ही कैसे धीमी हो जाती है Cable Car?

आधुनिक Ropeway Technology में सबसे खास तकनीक Detachable Grip System मानी जाती है। यही तकनीक यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा दोनों सुनिश्चित करती है।

जब कोई केबिन स्टेशन के पास पहुंचता है तो वह मुख्य तेज रफ्तार केबल से अपने आप अलग हो जाता है। इसके बाद स्टेशन के अंदर लगे छोटे-छोटे रबर टायर और रोलर सिस्टम उस केबिन को बेहद धीमी गति से आगे बढ़ाते हैं। इससे यात्री आराम से उतर और चढ़ सकते हैं।

स्टेशन से बाहर निकलते समय यही सिस्टम फिर केबिन की स्पीड बढ़ाता है और उसे वापस मुख्य केबल से जोड़ देता है। यह पूरा प्रोसेस ऑटोमैटिक सेंसर और कंट्रोल सिस्टम के जरिए संचालित होता है।

यही वजह है कि यात्रियों को स्टेशन पर उतरते समय झटका महसूस नहीं होता और पूरी यात्रा काफी स्मूद लगती है।

हवा में लटकती भारी केबल को कौन संभालता है?

दो स्टेशनों के बीच रोपवे की सबसे बड़ी चुनौती होती है भारी स्टील केबल को हवा में संतुलित बनाए रखना। इसके लिए पूरे रास्ते में विशाल टावर लगाए जाते हैं। इन्हीं टावरों पर केबल टिकती है।

हर टावर के ऊपरी हिस्से में विशेष रोलर लगाए जाते हैं जो रबर और स्टील से बने होते हैं। जब केबल आगे बढ़ती है तो यह रोलर उसे सपोर्ट देते हैं और दिशा बनाए रखते हैं। इससे केबल नीचे नहीं झुकती और केबिन सुरक्षित तरीके से हवा में चलते रहते हैं।

गुलमर्ग जैसे पहाड़ी इलाकों में ये टावर अत्यधिक मजबूत बनाए जाते हैं क्योंकि वहां तेज हवा और भारी बर्फबारी का दबाव काफी ज्यादा होता है।

आखिर कितना वजन उठा सकती है एक केबल कार?

आमतौर पर बड़े रोपवे सिस्टम के एक केबिन में 6 से 8 लोग आराम से बैठ सकते हैं। एक केबिन लगभग 600 से 800 किलोग्राम तक वजन उठाने में सक्षम होता है। हालांकि आधुनिक हाई-कैपेसिटी रोपवे इससे भी ज्यादा वजन उठाने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

पूरे सिस्टम में एक साथ कई केबिन चलते हैं। ऐसे में मुख्य स्टील केबल को इस तरह तैयार किया जाता है कि वह कई टन भार सह सके। इसके साथ ही तेज हवा और मौसम के दबाव को झेलने की क्षमता भी उसमें होती है।

इसी वजह से Ropeway Systems को डिजाइन करने से पहले विस्तृत इंजीनियरिंग टेस्ट और लोड कैलकुलेशन किए जाते हैं।

बिजली चली जाए तो क्या होता है?

सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि अगर Ropeway बीच हवा में रुक जाए तो यात्रियों की जान कैसे बचती है। आधुनिक Cable Car Systems में इसके लिए मल्टी लेयर सेफ्टी सिस्टम लगाए जाते हैं।

अगर अचानक बिजली चली जाए तो सिस्टम तुरंत Emergency Brake एक्टिव कर देता है। इससे केबिन वहीं स्थिर हो जाते हैं और पीछे की तरफ नहीं लुढ़कते।

इसके अलावा लगभग हर बड़े Ropeway में बैकअप डीजल इंजन मौजूद होता है। अगर मुख्य मोटर फेल हो जाए तो यही इंजन धीरे-धीरे केबल को घुमाकर यात्रियों को नजदीकी स्टेशन तक पहुंचाता है।

कई आधुनिक सिस्टम में बैटरी बैकअप और ऑटोमैटिक कंट्रोल यूनिट भी होती हैं जो किसी भी खतरे की स्थिति में तुरंत अलर्ट जारी करती हैं।

आखिर क्यों रुक जाती है Ropeway?

रोपवे सिस्टम में खराबी आने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ा खतरा खराब मौसम माना जाता है। तेज हवा चलने पर सेंसर तुरंत सिस्टम को रोक देते हैं ताकि केबिन असंतुलित न हों।

इसके अलावा बिजली की सप्लाई में उतार-चढ़ाव, मोटर फेल होना, पुली में तकनीकी खराबी, कंट्रोल पैनल एरर और सेंसर फेलियर भी Ropeway रुकने की बड़ी वजह बनते हैं।

बर्फीले इलाकों में अत्यधिक ठंड के कारण मशीनों के मैकेनिकल पार्ट्स जमने लगते हैं। इससे रोलर और पुली सिस्टम प्रभावित हो सकता है। गुलमर्ग जैसे क्षेत्रों में यही सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है।

क्या Ropeway में सफर करना सुरक्षित है?

विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक रोपवे दुनिया के सबसे सुरक्षित ट्रांसपोर्ट सिस्टम में गिने जाते हैं। इन्हें इंटरनेशनल सेफ्टी स्टैंडर्ड के तहत डिजाइन किया जाता है। हर दिन इनके केबल, मोटर, सेंसर, पुली और ब्रेक सिस्टम की जांच की जाती है।

हालांकि किसी भी मशीन की तरह इसमें भी तकनीकी खराबी की संभावना बनी रहती है। लेकिन मल्टीपल बैकअप सिस्टम और इमरजेंसी ब्रेक यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला हादसे ने एक बार फिर दिखा दिया कि तकनीक कितनी भी एडवांस क्यों न हो, पहाड़ों में मौसम और मशीनों का संतुलन बेहद अहम होता है। यही वजह है कि Ropeway सिस्टम को दुनिया की सबसे जटिल लेकिन सबसे रोमांचक इंजीनियरिंग तकनीकों में गिना जाता है।