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इधर जुमे की नमाज चलती रही, उधर हाईकोर्ट ने भोजशाला को बताया मंदिर! राम मंदिर जैसा बड़ा फैसला, मुस्लिम पक्ष जाएगा सुप्रीम कोर्ट


मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला को मंदिर मानते हुए हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया, मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा।

मध्य प्रदेश के धार स्थित बहुचर्चित भोजशाला विवाद पर शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर माना और हिंदू समुदाय के पूजा अधिकार को बरकरार रखा। अदालत ने एएसआई के 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी। फैसले के दौरान परिसर में जुमे की नमाज चल रही थी, जिसके बाद इसे वहां की आखिरी नमाज माना जा रहा है। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अलग जमीन दिए जाने पर राज्य सरकार को विचार करने की बात भी कही। इस फैसले के बाद देशभर में राजनीतिक और धार्मिक बहस तेज हो गई है।

भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

धार की भोजशाला लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच विवाद का केंद्र रही है। शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि भोजशाला मूल रूप से हिंदू मंदिर है और यहां हिंदुओं को पूजा करने का पूरा अधिकार रहेगा। अदालत ने साफ किया कि 7 अप्रैल 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI द्वारा जारी वह आदेश कानून के अनुरूप नहीं था, जिसमें हिंदुओं की पूजा पर सीमित रोक और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एएसआई संरक्षित स्मारक होने के बावजूद इस स्थल के ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य इसे हिंदू धार्मिक स्थल साबित करते हैं। अदालत ने केंद्र सरकार और ASI को परिसर के प्रशासन, प्रबंधन और संस्कृत शिक्षा से जुड़े प्रावधानों पर उचित व्यवस्था बनाने का निर्देश भी दिया।

फैसले के तुरंत बाद हिंदू संगठनों में खुशी की लहर दौड़ गई। धार और इंदौर सहित कई इलाकों में लोगों ने मिठाइयां बांटीं और इसे ऐतिहासिक जीत बताया। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की घोषणा कर दी।

जुमे की नमाज के बीच आया फैसला, बढ़ी सियासी हलचल

फैसले का समय भी बेहद चर्चित रहा क्योंकि जब हाईकोर्ट अपना आदेश सुना रहा था, उसी दौरान भोजशाला परिसर में जुमे की नमाज अदा की जा रही थी। फैसले के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई।

Asaduddin Owaisi ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस फैसले को पलटेगा। उन्होंने इस निर्णय की तुलना बाबरी मस्जिद फैसले से करते हुए कहा कि दोनों मामलों में कई समानताएं दिखाई देती हैं।

धार शहर काजी वकार सादिक ने कहा कि मुस्लिम समुदाय न्यायालय का सम्मान करता है, लेकिन फैसले का अध्ययन करने के बाद इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। उन्होंने कहा कि समुदाय कानूनी लड़ाई जारी रखेगा।

इस बीच हिंदू पक्ष के अधिवक्ता Vishnu Shankar Jain ने इसे ऐतिहासिक फैसला बताया। उन्होंने कहा कि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि भोजशाला राजा भोज के काल का मंदिर परिसर है और अब वहां केवल हिंदू पूजा होगी। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट ने सरकार को लंदन के संग्रहालय में रखी देवी सरस्वती की प्रतिमा वापस लाने के अनुरोध पर विचार करने का निर्देश दिया है।

मुस्लिम पक्ष को अलग जमीन देने की बात क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया। अदालत ने कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष मस्जिद निर्माण के लिए धार जिले में अलग जमीन चाहता है तो वह राज्य सरकार को आवेदन दे सकता है और सरकार कानून के अनुसार उस पर विचार कर सकती है।

यही वजह है कि इस फैसले की तुलना अयोध्या राम मंदिर फैसले से की जा रही है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि हिंदू पक्ष को देने के साथ मुस्लिम समुदाय को अलग पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भोजशाला फैसले के बाद आने वाले दिनों में देशभर में धार्मिक और राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है। खासकर इसलिए क्योंकि मामला सीधे धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक दावों से जुड़ा हुआ है।

आखिर क्या है भोजशाला विवाद?

धार स्थित भोजशाला 11वीं सदी का एक ऐतिहासिक परिसर है, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित स्मारक घोषित किया हुआ है। हिंदू समुदाय का दावा है कि यह देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर और विद्या केंद्र था, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है।

विवाद का बड़ा मोड़ साल 2003 में आया, जब ASI ने एक व्यवस्था लागू की। इसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई। लंबे समय तक यही व्यवस्था लागू रही।

बाद में हिंदू पक्ष ने अदालत में याचिका दाखिल कर पूरी भोजशाला हिंदुओं को सौंपने और मुस्लिम समुदाय की नमाज पर रोक लगाने की मांग की। इसके बाद अदालत ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया। मुस्लिम पक्ष ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद कुछ समय के लिए सर्वे पर रोक लगी।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे रिपोर्ट को खोलने और सभी पक्षों को उसकी कॉपी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। इसके बाद हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई शुरू हुई।

हिंदू पक्ष ने क्या दावे किए?

हिंदू समुदाय से जुड़े याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दावा किया कि भोजशाला मूल रूप से राजा भोज के शासनकाल का सरस्वती मंदिर था। उन्होंने कहा कि परिसर में मौजूद स्तंभ, मूर्तियां, वास्तुकला और शिलालेख हिंदू धार्मिक स्थल होने के पर्याप्त प्रमाण देते हैं।

हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि यहां संस्कृत शिक्षा दी जाती थी और यह स्थान प्राचीन गुरुकुल के रूप में भी प्रसिद्ध था। अदालत में पेश पुरातात्विक दस्तावेजों में कई प्रतीकों और कलाकृतियों का उल्लेख किया गया, जिन्हें हिंदू धार्मिक पहचान से जोड़ा गया।

मुस्लिम पक्ष ने क्या कहा?

मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने अदालत में दलील दी कि इतिहास में कहीं भी धार के किसी सरस्वती मंदिर को तोड़े जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। उन्होंने यह भी कहा कि 1935 में तत्कालीन शासक द्वारा जारी आदेश के तहत मुस्लिम समुदाय को यहां नमाज पढ़ने का अधिकार दिया गया था।

मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा कि वर्षों से वहां नमाज होती रही है और इस परंपरा को अचानक समाप्त करना धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

हालांकि सरकार की ओर से कहा गया कि 1904 के प्राचीन स्मारक संरक्षण कानून के तहत इस स्थल को पहले ही संरक्षित घोषित किया जा चुका था, इसलिए 1935 का आदेश वैध नहीं माना जा सकता।

जैन समुदाय ने भी किया दावा

भोजशाला विवाद में जैन समुदाय का भी एक पक्ष सामने आया। जैन समुदाय से जुड़े वकीलों ने अदालत में कहा कि इस परिसर की वास्तुकला राजस्थान के माउंट आबू स्थित जैन मंदिरों जैसी दिखाई देती है। उनका दावा था कि यह स्थान पहले जैन मंदिर और गुरुकुल का हिस्सा रहा होगा।

हालांकि अदालत ने अपने अंतिम फैसले में हिंदू पक्ष के दावों को अधिक मजबूत माना।

सरस्वती प्रतिमा को लेकर भी उठी बड़ी मांग

फैसले के दौरान लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी देवी सरस्वती की प्रतिमा का मुद्दा भी चर्चा में रहा। हिंदू पक्ष ने मांग की कि प्रतिमा को भारत वापस लाकर भोजशाला परिसर में स्थापित किया जाए।

कोर्ट ने इस मांग पर कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही केंद्र सरकार को कई ज्ञापन दे चुके हैं और सरकार इस मामले पर विचार कर सकती है। अदालत ने कहा कि यदि केंद्र सरकार चाहे तो ब्रिटिश म्यूजियम से प्रतिमा वापस लाने के लिए आवश्यक कदम उठा सकती है।

फैसले के बाद बढ़ी सुरक्षा

फैसले को देखते हुए धार और आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। पुलिस और प्रशासन को अलर्ट मोड पर रखा गया है ताकि किसी प्रकार का तनाव या विवाद न हो।

प्रशासनिक अधिकारियों ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। सोशल मीडिया पर भी फैसले को लेकर भारी चर्चा देखने को मिल रही है, जहां एक पक्ष इसे ऐतिहासिक जीत बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।

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