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3 लाख की पहली वसूली के बाद हर महीने 1 लाख की मांग! सहारनपुर में रंगे हाथ पकड़ा गया रिश्वतखोर अधिकारी, खुली भ्रष्टाचार की पूरी साजिश



सहारनपुर में राज्य कर अधिकारी 1 लाख रिश्वत लेते पकड़ा गया, व्यापारी से पहले 3 लाख और हर महीने वसूली की मांग का बड़ा खुलासा

सहारनपुर में भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई में राज्य कर विभाग के एक अधिकारी को एक लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया। आरोपी अधिकारी पर आरोप है कि उसने पहले व्यापारी से करीब तीन लाख रुपये वसूले और फिर हर महीने एक लाख रुपये देने का दबाव बनाया। मेरठ सेक्टर की सतर्कता टीम ने जाल बिछाकर उसे उसके ही आवास से गिरफ्तार किया, जिसके बाद पूरे विभाग में हड़कंप मच गया है और भ्रष्टाचार के नेटवर्क की परतें खुलने लगी हैं।

कैसे शुरू हुआ रिश्वतखोरी का खेल

पूरा मामला एक व्यापारी की शिकायत से सामने आया, जो सहारनपुर से रुड़की तक माल सप्लाई करता है। व्यापारी ने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारी सीमा क्षेत्र में तैनाती के दौरान वाहनों की जांच करता था और जानबूझकर कागजों में कमी निकालकर कारोबारियों को परेशान करता था। यह प्रक्रिया सिर्फ जांच तक सीमित नहीं थी बल्कि इसके जरिए अवैध वसूली का दबाव बनाया जाता था।

बताया गया कि 28 मार्च 2026 को व्यापारी जब स्क्रैप लेकर जा रहा था, तब सहारनपुर बाईपास पर उसके वाहन को रोक लिया गया। अधिकारी ने कागजों में खामियां निकालकर वाहन को जब्त कर लिया और उसे राज्य कर कार्यालय में खड़ा करा दिया। इसके बाद व्यापारी पर करीब तीन लाख रुपये जमा कराने का दबाव बनाया गया। यह दबाव केवल कानूनी कार्रवाई के नाम पर नहीं था, बल्कि इसके पीछे रिश्वत की पूरी साजिश छिपी हुई थी।

व्यापारी को साफ संकेत दिया गया कि अगर वह रकम नहीं देगा तो उसका काम पूरी तरह ठप कर दिया जाएगा। इस दबाव में आकर व्यापारी को पैसे की व्यवस्था करनी पड़ी और मामला यहीं खत्म नहीं हुआ, बल्कि इसके बाद रिश्वतखोरी का असली खेल शुरू हुआ।

सरकारी खाते और नकद वसूली का दोहरा खेल

दो अप्रैल 2026 को जब व्यापारी रकम लेकर कार्यालय पहुंचा, तब अधिकारी ने नई शर्त रख दी। उसने कहा कि करीब एक लाख 95 हजार रुपये सरकारी खाते में जमा कराए जाएं और बाकी एक लाख पांच हजार रुपये नकद दिए जाएं। व्यापारी ने मजबूरी में अलग-अलग खातों से क्यूआर कोड के जरिए सरकारी खाते में रकम ट्रांसफर कर दी।

लेकिन नकद दिए गए पैसे का कोई रिकॉर्ड नहीं दिया गया। न कोई रसीद और न कोई आधिकारिक एंट्री। इस तरह से सरकारी प्रक्रिया के नाम पर निजी वसूली का खेल खुलकर सामने आया। नकद राशि लेने के बाद ही वाहन को छोड़ा गया, जिससे साफ हो गया कि पूरा मामला संगठित भ्रष्टाचार का हिस्सा था।

यहां तक कि अधिकारी ने व्यापारी को यह भी संकेत दिया कि अगर वह भविष्य में बिना रुकावट व्यापार करना चाहता है तो उसे नियमित रूप से पैसे देने होंगे। इस तरह सरकारी सिस्टम का इस्तेमाल करके व्यापारियों को मानसिक और आर्थिक रूप से दबाव में रखा जा रहा था।

हर महीने 1 लाख की डिमांड और फिर जाल में फंसा अधिकारी

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। चार अप्रैल को एक अन्य ई-वे बिल के मामले में भी अधिकारी ने फिर से एक लाख रुपये की मांग कर दी। इस बार उसने सीधे संदेश भेजा कि अगर व्यापारी को बिना परेशानी काम करना है तो हर महीने एक लाख रुपये देना होगा।

लगातार बढ़ती मांग और उत्पीड़न से परेशान होकर व्यापारी ने आखिरकार सतर्कता अधिष्ठान में शिकायत दर्ज कराई। प्रारंभिक जांच में आरोप सही पाए गए, जिसके बाद मेरठ सेक्टर की टीम ने एक सुनियोजित ट्रैप तैयार किया।

योजना के तहत व्यापारी को फिर से आरोपी के संपर्क में भेजा गया और तय रकम लेकर उसके पास पहुंचाया गया। जैसे ही अधिकारी ने अपने आवास पर एक लाख रुपये लिए, टीम ने मौके पर छापा मार दिया और उसे रंगे हाथ पकड़ लिया। गिरफ्तारी के बाद पूरे विभाग में हड़कंप मच गया और कई अन्य मामलों की भी जांच शुरू कर दी गई है।

गिरफ्तारी के बाद आरोपी से लगातार पूछताछ की जा रही है और उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि पूरे नेटवर्क की जांच की जाएगी।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किस तरह सरकारी सिस्टम के अंदर बैठकर कुछ अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर आम लोगों और व्यापारियों को निशाना बनाते हैं। सतर्कता टीम की इस कार्रवाई को एक बड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि अब भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई जारी रहेगी और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।

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