एमपी में एक ही MBBS डिग्री पर 15 साल तक दो डॉक्टर नौकरी करते रहे, बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर, मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल
15 साल तक चलता रहा ‘डबल डॉक्टर’ का खेल
मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग से सामने आया यह चौंकाने वाला मामला प्रशासनिक लापरवाही की गंभीर तस्वीर पेश करता है, जहां एक ही एमबीबीएस डिग्री के आधार पर दो अलग-अलग जिलों में दो व्यक्ति डॉक्टर बनकर सरकारी नौकरी करते रहे। बालाघाट और देवास जिलों में तैनात इन दोनों ‘डॉक्टरों’ ने करीब 15 वर्षों तक न केवल सरकारी सेवा की बल्कि हजारों मरीजों का इलाज भी किया। हैरानी की बात यह है कि इतने लंबे समय तक विभाग को इस फर्जीवाड़े की भनक तक नहीं लगी और सिस्टम आंख मूंदकर सब कुछ चलता रहा
एक नाम, एक जन्मतिथि, एक डिग्री… फिर भी दो पहचान
पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों व्यक्तियों की शैक्षणिक जानकारी लगभग एक जैसी है। दोनों का नाम सुनील कुमार, पिता का नाम मोहन सिंह, जन्मतिथि 1 फरवरी 1978 और वर्ष 2006 में एपीएसयू रीवा से एमबीबीएस डिग्री का रिकॉर्ड सामने आया है। यही समानता अब इस बड़े फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा सबूत बन गई है जिसने पूरे स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा दिया है
बालाघाट का ‘संदिग्ध डॉक्टर’ और बढ़ता शक
बालाघाट जिले के बिरसा में बीएमओ पद पर कार्यरत सुनील कुमार सिंह की पहचान को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठे हैं। जानकारी के अनुसार उन्होंने वर्ष 2012 में संविदा पर मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवा शुरू की थी। उनके पास केवल प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन होने और दस्तावेजों में विरोधाभास मिलने के बाद जांच की दिशा बदल गई। प्रारंभिक जांच में यह आशंका जताई जा रही है कि जिस डिग्री के आधार पर वे नौकरी कर रहे हैं, उसमें गंभीर गड़बड़ी हो सकती है
देवास में तैनात दूसरा डॉक्टर और ‘असली पहचान’
दूसरी ओर देवास जिला अस्पताल में कार्यरत सुनील कुमार ने अपनी ओरिजिनल डिग्री और स्थायी पंजीयन प्रस्तुत किया है। उनका पंजीयन नंबर 2909 बताया जा रहा है और उन्होंने वर्ष 2011 में एमपी पीएससी के माध्यम से मेडिकल ऑफिसर के रूप में नियुक्ति पाई थी। दस्तावेजों के आधार पर उन्हें असली डॉक्टर माना जा रहा है, जिससे यह मामला और भी गंभीर हो गया है कि आखिर दूसरा व्यक्ति इतने सालों तक सिस्टम को कैसे धोखा देता रहा
करोड़ों की सैलरी और निजी प्रैक्टिस का खेल
इन 15 वर्षों के दौरान दोनों व्यक्तियों ने सरकारी खजाने से मोटी सैलरी प्राप्त की। इसके अलावा निजी क्लीनिक चलाकर भी भारी कमाई की गई। यदि जांच में फर्जीवाड़ा साबित होता है, तो यह मामला केवल पहचान की चोरी तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसमें सरकारी धन की हेराफेरी और मरीजों की जान से खिलवाड़ जैसे गंभीर आरोप भी जुड़ सकते हैं
मरीजों की जान पर बना बड़ा सवाल
इस पूरे मामले ने सबसे बड़ा सवाल उन मरीजों की सुरक्षा को लेकर खड़ा कर दिया है, जिन्होंने बालाघाट में संदिग्ध डॉक्टर से इलाज कराया। यदि वह वास्तव में फर्जी है, तो क्या उसका इलाज सही था? क्या मरीजों को सही दवाइयां दी गईं या उनकी जान जोखिम में डाली गई? यह सवाल अब स्वास्थ्य विभाग के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है
पहले भी आई थी शिकायत, फिर भी नहीं हुआ खुलासा
बालाघाट के सीएमएचओ डॉ. परेश उपलप के अनुसार इस मामले में पहले भी शिकायत मिली थी, जिसके बाद डिग्री की जांच कराई गई थी। उस समय विश्वविद्यालय से डिग्री सही होने की पुष्टि की गई थी। हालांकि उस जांच में पंजीयन नंबर की पूरी जानकारी सामने नहीं आई थी, जो अब इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गई है
दस्तावेजों की दोबारा जांच और बढ़ी हलचल
मामला फिर से सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। संबंधित सभी दस्तावेजों को दोबारा राज्य स्वास्थ्य संचालनालय भोपाल भेजा जा रहा है, जहां से विस्तृत जांच की जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि इस बार किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं बरती जाएगी और सच्चाई सामने लाने के लिए पूरी प्रक्रिया अपनाई जाएगी
सवालों के घेरे में सिस्टम और जिम्मेदार अधिकारी
यह मामला केवल एक व्यक्ति के फर्जी होने का नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। आखिर कैसे एक ही डिग्री पर दो लोग वर्षों तक नौकरी करते रहे? नियुक्ति प्रक्रिया में किन स्तरों पर चूक हुई? और किसकी जिम्मेदारी तय होगी? ये सभी सवाल अब प्रशासन के सामने खड़े हैं
संदिग्ध डॉक्टर की चुप्पी ने बढ़ाया रहस्य
इस पूरे मामले में सबसे अहम किरदार माने जा रहे बालाघाट के संदिग्ध बीएमओ सुनील कुमार सिंह ने पूरी तरह चुप्पी साध ली है। न तो वे फोन कॉल का जवाब दे रहे हैं और न ही किसी प्रकार का आधिकारिक बयान सामने आया है। उनकी यह खामोशी मामले को और ज्यादा रहस्यमय बना रही है
आगे क्या होगी कार्रवाई
अब पूरा मामला राज्य स्तर पर पहुंच चुका है और स्वास्थ्य संचालनालय द्वारा इसकी गहन जांच की तैयारी की जा रही है। यदि जांच में फर्जीवाड़ा साबित होता है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के साथ-साथ विभागीय कार्रवाई भी की जा सकती है। साथ ही उन अधिकारियों पर भी सवाल उठ सकते हैं जिन्होंने वर्षों तक इस मामले को नजरअंदाज किया
स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसे की परीक्षा
यह मामला सिर्फ एक घोटाले का नहीं बल्कि आम लोगों के भरोसे का भी है। सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों को यह भरोसा होता है कि उनका इलाज योग्य डॉक्टर कर रहा है, लेकिन इस घटना ने उस भरोसे को गहरा झटका दिया है। आने वाले दिनों में जांच के नतीजे यह तय करेंगे कि इस विश्वास को फिर से कैसे कायम किया जाएगा


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