फरीदनगर में हजरत मुल्लन मियां के 10वें उर्स में उमड़ा जनसैलाब, देश-विदेश से पहुंचे अकीदतमंद, चादरपोशी और लंगर में दिखी गंगा-जमुनी तहजीब



फरीदनगर में हजरत मुल्लन मियां का 10वां उर्स धूमधाम से मनाया गया, चादरपोशी, लंगर और सूफी महफिल में सैकड़ों लोग शामिल


उर्स का आगाज और सूफियाना माहौल

कस्बा फरीदनगर में हजरत कूत्बे आलम हाफिज अलीमुल्लाह शाह उर्फ मुल्लन मियां कादरी राजशाही का 10वां सालाना उर्स इस बार भव्य और ऐतिहासिक अंदाज में मनाया गया, जहां दूर-दूर से आए अकीदतमंदों ने सूफी रंग में डूबकर अपनी हाजिरी पेश की। उर्स के मौके पर दरगाह शरीफ को खास तरीके से सजाया गया, रोशनी और इत्र की खुशबू से पूरा माहौल रूहानी हो गया। कार्यक्रम की शुरुआत तिलावते कलाम-ए-पाक से हुई, जिसे हाफिज व कारी इसरार रजा राजशाही और हाफिज उवैस ने खूबसूरत अंदाज में पेश किया। उनकी तिलावत ने मौजूद लोगों के दिलों में सुकून और आस्था की लहर दौड़ा दी।

सूफी शायरी और तकरीरों ने बांधा समां

महफिल के दौरान शायरे इस्लाम इंतखाब आलम सम्भली राजशाही ने अपनी सूफियाना शायरी से ऐसा समां बांधा कि हर शख्स उनकी आवाज में डूबता चला गया। उनकी शायरी में इश्क-ए-इलाही, औलिया की करामात और इंसानियत का संदेश साफ झलक रहा था। निजामत के फर्ज हाफिज ताहिर साहब अशरफी ने बखूबी निभाए और पूरे कार्यक्रम को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया। हाफिज मोहम्मद उमर राजशाही अलीमी हमीदी ने अपनी तकरीर में मुल्लन मियां की जिंदगी और उनकी खिदमतों पर रोशनी डाली, जिससे युवाओं को भी उनके रास्ते पर चलने की प्रेरणा मिली।

मेहमान-ए-खुसूसी की मौजूदगी और संदेश

इस उर्स में मेहमान-ए-खुसूसी के तौर पर हजरत अल्लामा मौलाना शमश कादरी, जो मदरसा इस्लामी अरबी अन्दर कोट मेरठ के प्रिंसिपल हैं, ने सदारत की। उन्होंने अपने संबोधन में सूफी परंपरा और औलिया-ए-किराम की अहमियत पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में भाईचारे और इंसानियत को मजबूत करते हैं और लोगों को सही राह दिखाते हैं। उनकी मौजूदगी ने कार्यक्रम की गरिमा को और भी बढ़ा दिया।

करामातों और दुआओं का जिक्र

नमुकर्रिर-ए-खुसूसी हजरत अल्लामा मौलाना मुफ्ती रहमतउल्लाह साहब मिस्बाही खुशहाली राजशाही ने अपनी तकरीर में मुल्लन मियां की करामातों का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी दुआ कभी खाली नहीं गई। उन्होंने बताया कि जो भी सच्चे दिल से यहां आया और दुआ मांगी, उसे अल्लाह ने जरूर नवाजा। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि 10 साल बाद भी उनके दीवाने देश और विदेश में फैले हुए हैं और उनकी याद में यह उर्स लगातार भव्य होता जा रहा है।

औलिया की दरगाह और आस्था का संगम

मुफ्ती आजम मेरठ इश्तियाकुल कादरी साहब ने भी अपने संबोधन में मुल्लन मियां की महानता और उनकी करामातों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि औलिया के दरबार में कभी कोई खाली नहीं लौटता और यहां हर किसी की झोली भरती है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने खुद मुल्लन मियां की कई करामातें देखी हैं, जो आज भी लोगों के दिलों में उनकी आस्था को मजबूत करती हैं।

सज्जादा नशीन की खिदमत और सामाजिक संदेश

मुफ्ती रहीस साहब ने कहा कि हजरत मुल्लन मियां के नक्शे कदम पर चलते हुए दरगाह के सज्जादा नशीन हजरत मौलाना हमीदुल्लाह राजशाही सभी लोगों की बिना भेदभाव के सेवा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यहां आने वाले हर व्यक्ति को समान रूप से सम्मान और मदद मिलती है, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। यह दरगाह समाज में एकता और भाईचारे की मिसाल बनी हुई है।

चादरपोशी और गंगा-जमुनी तहजीब की झलक

उर्स के दौरान दरगाह शरीफ पर चादरपोशी की रस्म अदा की गई, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। गुलपोशी की रस्म भी अदा की गई, जहां फूलों की खुशबू से पूरा माहौल महक उठा। इस दौरान गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल देखने को मिली, जहां सभी लोग मिलजुलकर इस पवित्र आयोजन का हिस्सा बने।

लंगर और भंडारे में उमड़ी भीड़

रात में बड़े स्तर पर लंगर यानी भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों लोगों ने एक साथ बैठकर खाना खाया। यह लंगर सिर्फ भोजन नहीं बल्कि आपसी भाईचारे और समानता का प्रतीक था। सुबह जलसे के बाद सलातो सलाम और कुल शरीफ की रस्म अदा की गई, जिसमें सभी ने मिलकर दुआएं मांगीं।

मुल्क की तरक्की और अमन के लिए दुआ

कार्यक्रम के आखिर में दरगाह के सज्जादा नशीन पीरे तरीकत हजरत मौलाना हमीदुल्लाह राजशाही ने देश की तरक्की, अमन और भाईचारे के लिए विशेष दुआ कराई। इस दुआ में सैकड़ों लोगों ने एक साथ हाथ उठाकर ‘आमीन’ कहा। इस दृश्य ने पूरे माहौल को और भी भावुक और रूहानी बना दिया।

देश-विदेश से पहुंचे अकीदतमंद

इस उर्स में सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं बल्कि देश और विदेश से भी अकीदतमंद पहुंचे। साउथ अफ्रीका से आए निशात खान अलीमी समेत कई प्रमुख लोग इस आयोजन का हिस्सा बने। इसके अलावा अंसार खान, काशिफ खान, सूफी अशरफ उल्लाह, हाफिज दानिश, हाजी दीन मोहम्मद, सूफी अशफाक, जियाउल्लाह खान, समीर उल्लाह, सूफी निशात उल्लाह, सोनू, आसिफ उल्ला, इकरामुल्लाह खान, शमशाद राजशाही, सूफी फिरोज, शकील खान, शोएब खान, सूफी सगीर, आस मोहम्मद, साबिर, रहीस, शाकिर, रामू, ओमकार, सूफी नईम, सूफी पिंटू, हाफिज गुफरान, अजीम, बशारत, सूफी युनूस, अली खान, नबील खान, डॉक्टर समीह खान, जुल्फिकार, जिकरिया खान, मुश्ताक खान, अशरफ खान, अरशद खान, जुनैद खान, नावेद, शब्बू खान, हाजी अब्दुल गफ्फार, सूफी जाहिद, सूफी रियासत, शमीम आलम, कैफ, आरिफ उल्लाह, वकार, सूफी जहीर, शाहनवाज खान, शाह फैज खान सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।

सूफी परंपरा और समाज पर प्रभाव

यह उर्स सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि समाज में प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश देने वाला एक बड़ा मंच बनकर उभरा। यहां हर धर्म और वर्ग के लोगों ने एक साथ बैठकर इबादत की, दुआ मांगी और लंगर में हिस्सा लिया। यह आयोजन इस बात का प्रतीक है कि सूफी परंपरा आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है और समाज को जोड़ने का काम कर रही है।

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