महाकुंभ में साध्वी बनी आगरा की 13 वर्षीय बेटी 10 माह बाद घर लौटी, परिवार ने पुलिस-काउंसलिंग से पार किया मुश्किल संन्यास का इम्तिहान
महाकुंभ 2024 में 13 वर्षीय बच्ची का साध्वी बनने का फैसला, परिवार में मचा हड़कंप
उत्तर प्रदेश के आगरा की एक 13 साल की मासूम बच्ची 2024 में प्रयागराज महाकुंभ के दौरान अचानक चर्चा का विषय बन गई थी। अपनी उम्र से कई गुना बड़े फैसले लेते हुए उसने साध्वी बनने और गृहस्थ जीवन से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया था। यह घटना सिर्फ उसके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और प्रशासन के लिए चिंता का कारण बन गई। महाकुंभ की लाखों की भीड़ के बीच, अचानक बेटी के संन्यासी बनने के फैसले से उसके माता-पिता के पैरों तले जमीन खिसक गई। महज 13 साल की उम्र में बेटी को खो देने का डर, माता-पिता को भीतर से तोड़ गया।
महाकुंभ की भीड़ में आया था बेटी के मन में साध्वी बनने का संकल्प
बताया जाता है कि आगरा के डौकी क्षेत्र की रहने वाली यह लड़की अपने माता-पिता के साथ 5 दिसंबर 2024 को प्रयागराज महाकुंभ पहुंची थी। महाकुंभ जैसे भव्य धार्मिक आयोजन में आस्था और अध्यात्म का माहौल उसके दिलो-दिमाग पर छा गया। इसी माहौल में उसने अचानक संन्यास लेने का फैसला कर लिया। उसने सार्वजनिक रूप से ऐलान कर दिया कि वह अब संन्यासिनी के रूप में जीवन बिताना चाहती है और परिवार के साथ वापस नहीं जाएगी।
साध्वी बनने की प्रक्रिया, परिवार का संघर्ष और बेटी का नया नाम
लड़की का फैसला सुनकर परिजन हैरान रह गए। वे लाख समझाने की कोशिश करते रहे, मगर उसने घर लौटने से साफ इनकार कर दिया। इस दौरान उसका झुकाव जूना अखाड़े के महंत कौशल गिरि की ओर हुआ। परिजन ने भारी मन से बेटी को गुरु के हवाले कर दिया। विधिवत धार्मिक अनुष्ठानों के बाद महंत ने बच्ची को गंगा स्नान करवाया, संन्यास की दीक्षा दी और उसका नया नाम रखा गया- साध्वी गौरी। परिवार के लिए यह पल असहनीय था, मगर बच्ची अपनी जिद और संकल्प पर अडिग रही।
हरियाणा आश्रम में शुरू हुआ साध्वी जीवन, माता-पिता की बढ़ी चिंता
महाकुंभ से संन्यास लेने के बाद बच्ची हरियाणा स्थित कौशल किशोर आश्रम चली गई। यहां उसने साध्वी जीवन की शुरुआत की, नवरात्र उपवास, ध्यान, साधना और दैनिक पूजा-पाठ उसकी दिनचर्या बन गई। घर, स्कूल, किताबें, दोस्त—सबकुछ छोड़कर वह साध्वी गौरी बन चुकी थी। उसकी उम्र और मानसिक अवस्था को देखते हुए माता-पिता लगातार बेचैन रहते थे। उन्होंने बेटी की वापसी के लिए हर दरवाजा खटखटाया।
परिवार की बेबसी, पुलिस और प्रशासन की मदद की गुहार
बेटी को घर वापस लाने के लिए परिवार ने पुलिस-प्रशासन से गुहार लगाई। मां-बाप ने जिला प्रशासन और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के पास बच्ची की सुरक्षा और मानसिक स्थिति को लेकर चिंता जताई। पूरे मामले की जानकारी मिलते ही स्थानीय पुलिस हरकत में आई। अधिकारियों ने हरियाणा के आश्रम में बच्ची का पता लगाकर, वहां की पुलिस की मदद ली। बच्ची को सुरक्षित लाने के लिए एक टीम भेजी गई।
काउंसलिंग के दौर, मनोवैज्ञानिकों और अधिकारियों ने की कई घंटे बातचीत
बच्ची को आगरा लाकर पुलिस और विशेषज्ञों की टीम ने उससे कई घंटों तक बात की। परिवार को भी काउंसलिंग में शामिल किया गया। मनोवैज्ञानिकों ने उसकी मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश की और उसे परिवार, शिक्षा और बच्चों के अधिकारों के महत्व के बारे में समझाया। काउंसलिंग टीम ने प्यार और धैर्य से बच्ची को अपनी भावनाएं खुलकर जाहिर करने का मौका दिया।
मनोविज्ञान और काउंसलिंग ने बदला 13 वर्षीय बच्ची का मन
लगातार कई दिनों की काउंसलिंग के बाद बच्ची के विचारों में धीरे-धीरे बदलाव आया। उसने खुद स्वीकार किया कि वह अपने माता-पिता के बिना अधूरी महसूस करती है। पुलिस और विशेषज्ञों की कोशिशों ने आखिरकार रंग दिखाया। साध्वी गौरी का मन बदला, और उसने संन्यासी जीवन छोड़कर परिवार के पास लौटने का निर्णय लिया।
वापसी के पल, माता-पिता के आंसू और घर में लौटी खुशियां
बच्ची की वापसी के पल घरवालों के लिए बेहद भावुक थे। बेटी को देखकर माता-पिता की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। बच्ची ने भी स्वीकार किया कि उसे परिवार के साथ रहना है और अब वह अपनी पढ़ाई पूरी कर समाज में एक अच्छा नागरिक बनना चाहती है। माता-पिता ने प्रशासन, पुलिस और काउंसलिंग टीम का आभार जताया।
आध्यात्मिक आकर्षण या सामाजिक दबाव: सवालों के घेरे में परिवार
यह घटना कई अहम सवाल भी छोड़ गई। क्या धार्मिक आयोजनों में जाने वाली किशोर उम्र की लड़कियों का इतना जल्दी प्रभावित हो जाना सही है? क्या समाज और परिवार को बच्चों की भावनाओं को और गंभीरता से लेने की जरूरत है? प्रशासन और चाइल्ड वेलफेयर से जुड़े विभागों को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।
पुलिस और प्रशासन ने कैसे पार की चुनौतियां
बच्ची को वापस लाने की प्रक्रिया में पुलिस और प्रशासन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बच्ची का मन बदलना आसान नहीं था। हरियाणा के आश्रम तक पहुंचने, वहां की व्यवस्थाओं से समन्वय करने और बच्ची की सुरक्षा सुनिश्चित करने में कई दिन लग गए। लेकिन जिला प्रशासन, पुलिस और मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों की टीम ने एकजुट होकर काम किया।
मामले में कानूनी पहलुओं और बच्चों के अधिकारों की चर्चा
13 वर्षीय बच्ची का संन्यास लेना भारतीय कानून के अनुसार विवादित है। बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए देश में कई कानून हैं, जिनमें नाबालिग बच्चों का विवाह, संन्यास या किसी भी प्रकार का असाधारण निर्णय लेना अवैध माना गया है। इस घटना के बाद चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने भी लड़की की देखभाल और सुरक्षा को लेकर जरूरी कदम उठाए।
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर फोकस, प्रशासन की नई पहल
इस घटना के बाद प्रशासन ने निर्णय लिया है कि धार्मिक आयोजनों में भाग लेने वाले नाबालिग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं को जागरूकता अभियान चलाने की सलाह दी गई है। बच्चों की काउंसलिंग और परिवार के साथ संवाद को प्राथमिकता देने की योजना बनाई जा रही है।
परिवार का बयान: हमारी बेटी अब हमारे साथ, शिक्षा ही सबसे बड़ा धर्म
बच्ची के माता-पिता ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे अब कभी भी बेटी पर धार्मिक या सामाजिक दबाव नहीं डालेंगे। वे चाहते हैं कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर समाज में नाम कमाए। परिवार का कहना है कि शिक्षा ही सबसे बड़ा धर्म है और आगे से वे अपनी बेटी के हर निर्णय में उसका साथ देंगे।
महाकुंभ में आने वाली चुनौतियों के बीच बच्ची की वापसी बनी मिसाल
इस घटना ने समाज में एक नई मिसाल कायम की है कि परिवार, प्रशासन, पुलिस और काउंसलिंग की मदद से कोई भी मुश्किल पार की जा सकती है। आगरा की इस बच्ची ने अपने घर लौटकर यह दिखा दिया कि परिवार का साथ, प्यार और संवाद किसी भी आस्था या जिद से बड़ा है।


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