राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि केवल सत्ता बदलने के लिए किए जाने वाले आंदोलन समाज की बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं करते। उन्होंने चेतावनी दी कि जनहित से अलग उद्देश्यों के लिए होने वाले विरोध प्रदर्शन राजनीतिक हथियार बन सकते हैं और सामाजिक विभाजन बढ़ा सकते हैं। भागवत ने भारत की प्रगति, संघ को कमजोर करने की कथित कोशिशों, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और नेपाल में आई त्रासदी के संदर्भ में भी अपने विचार रखे।
सत्ता परिवर्तन से हर समस्या का समाधान नहीं: मोहन भागवत
मोहन भागवत ने सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से चलाए जाने वाले आंदोलनों को लेकर कहा कि केवल राजनीतिक नेतृत्व बदलने से परिस्थितियों में अपेक्षित सुधार नहीं आता। उनके मुताबिक, कुछ ताकतें अपने हितों को साधने के लिए राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव को माध्यम बनाती हैं, लेकिन ऐसे प्रयासों से जरूरी नहीं कि समस्याओं का समाधान हो जाए।
भागवत ने कहा कि सत्ता बदलने से हालात बदल जाने का दावा किया जाता है, लेकिन वास्तविकता में ऐसा हमेशा नहीं होता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी आंदोलन का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे लोगों की वास्तविक समस्याओं के समाधान पर केंद्रित होना चाहिए।
उन्होंने आगाह किया कि जब विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है, तो उनका मूल उद्देश्य पीछे छूट सकता है। ऐसी परिस्थितियों में आंदोलन समाज को एकजुट करने के बजाय लोगों के बीच दूरी और टकराव बढ़ाने का कारण बन सकते हैं।
भारत की मजबूती और वैश्विक शक्तियों की भूमिका पर रखी बात
संघ प्रमुख ने कहा कि एक मजबूत भारत ऐसी ताकतों पर अंकुश लगाने में सक्षम होगा, जो देश को कमजोर करने या उसे विभाजित करने की कोशिश करती हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ वैश्विक शक्तियां भारत की प्रगति का समर्थन तो करती हैं, लेकिन वे नहीं चाहतीं कि भारत इतना शक्तिशाली बन जाए कि उनके मौजूदा वर्चस्व को चुनौती मिलने लगे।
भागवत के अनुसार, भारत की मजबूती देश को कमजोर करने और बांटने की कोशिशों का सामना करने के लिए जरूरी है। उन्होंने इस संदर्भ में राष्ट्रीय प्रगति और देश की एकजुटता के महत्व को रेखांकित किया।
भारत और RSS को कमजोर करने की कोशिशों का आरोप
मोहन भागवत ने कहा कि भारत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने पिछले एक दशक में भारत की प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने अनुशासित तरीके से आगे बढ़ने की दिशा में काम किया है, लेकिन कुछ ताकतें इस प्रगति में बाधा डालना चाहती हैं।
उन्होंने दावा किया कि इन कोशिशों को ऐसे तत्वों का भी समर्थन मिलता है, जो अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैं। भागवत के अनुसार, कुछ लोग अपने राजनीतिक और व्यक्तिगत हितों के कारण ऐसी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।
उन्होंने भारत, हिंदू समाज और संघ को कमजोर करने की योजनाओं का भी जिक्र किया। भागवत ने कहा कि कुछ ताकतें इन तीनों को विभाजित करने के उद्देश्य से योजनाबद्ध तरीके से काम करती हैं। उनके मुताबिक, कुछ लोग अपनी प्रवृत्ति के कारण ऐसी कोशिशों में सहयोग करते हैं, जबकि सत्ता का सीमित स्वार्थ और विवेकहीनता कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं को भी इसमें शामिल कर सकती है।
विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा, लेकिन उद्देश्य समाधान होना चाहिए
मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना स्वाभाविक है और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि समाज में समस्याएं बनी रह सकती हैं और उनके खिलाफ आवाज उठाना भी जरूरी है। हालांकि, विरोध का मकसद समस्याओं का समाधान तलाशना होना चाहिए, न कि समाज में पहले से मौजूद मतभेदों को और गहरा करना।
उन्होंने कहा कि जब प्रदर्शन जनहित के बजाय दूसरे उद्देश्यों से प्रेरित होते हैं, तो उनका इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति, समूह या विचारधारा के प्रति नफरत और दुश्मनी पैदा होने का खतरा रहता है।
भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि विरोध प्रदर्शन को समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उनके मुताबिक, केवल असहमति जाहिर करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन समस्याओं को समझना भी जरूरी है जिनके कारण लोग विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरते हैं।
राजनीतिक नेताओं और प्रशासन से मर्यादा बनाए रखने की अपील
संघ प्रमुख ने राजनीतिक नेताओं, प्रदर्शनकारियों और प्रशासन से अपील की कि उनके कार्यों से समाज में कड़वाहट या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में विचारों और भावनाओं की अभिव्यक्ति के दौरान भी संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करना जरूरी है।
भागवत के अनुसार, किसी मुद्दे पर भावनाएं कितनी भी तीव्र क्यों न हों, लोगों को संविधान द्वारा निर्धारित मर्यादाओं और सभ्य सार्वजनिक संवाद के नियमों का पालन करना चाहिए। उन्होंने संयमित आचरण को भी महत्वपूर्ण बताया।
उनकी अपील का मुख्य जोर इस बात पर था कि राजनीतिक असहमति और विरोध प्रदर्शनों के दौरान ऐसे कदमों से बचा जाए, जिनसे समाज में आपसी अविश्वास और कटुता बढ़े। उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल के साथ जिम्मेदारी और मर्यादा बनाए रखने की जरूरत पर बल दिया।
'संघ पूरे विश्व को अपना परिवार मानता है'
देश में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाए जाने के मुद्दे पर मोहन भागवत ने कहा कि कुछ लोग संघ की प्रगति को स्वीकार नहीं कर पाते और इसी वजह से संगठन पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने कहा कि संघ सभी का है और वह पूरे विश्व को अपना परिवार मानता है।
भागवत ने यह भी कहा कि संघ को अपने लिए कुछ नहीं चाहिए और वह अपने उद्देश्य की पूर्ति तक काम करता रहेगा। उन्होंने संगठन के निरंतर काम करते रहने की बात कही।
इस दौरान उन्होंने संघ के उद्देश्य और उसकी कार्यशैली को लेकर भी अपना पक्ष रखा। उनके बयान में संगठन के काम को जारी रखने और उसके घोषित लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने पर जोर दिया गया।
नेपाल की त्रासदी और हिमालयी क्षेत्र के विकास का जिक्र
मोहन भागवत ने नेपाल में हाल ही में हुई भीषण त्रासदी का उल्लेख करते हुए कहा कि इस घटना में हजारों लोगों की जान चली गई। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में एकतरफा विकास भी इस त्रासदी के संभावित कारणों में से एक हो सकता है।
उन्होंने बताया कि हिमालयी क्षेत्र भारत, तिब्बत, भूटान और चीन सहित कई देशों में फैला हुआ है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत पर दुख व्यक्त करते हुए भागवत ने कहा कि ऐसी आपदाओं के बाद प्रभावित लोगों की सहायता और राहत के लिए लोग स्वाभाविक रूप से एक साथ आते हैं।
उन्होंने विकास के प्रति समग्र और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक, विकास से जुड़े फैसलों में व्यापक परिस्थितियों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। नेपाल की त्रासदी का उल्लेख करते हुए उन्होंने इस बात पर ध्यान दिलाया कि विकास की दिशा तय करते समय उसके संभावित प्रभावों को भी समझना चाहिए।
ज्ञान और तकनीक के सही इस्तेमाल पर दिया जोर
भागवत ने कहा कि किसी भी साधन का इस्तेमाल किस दिशा में किया जाएगा और उसका उपयोग सही है या गलत, यह मनुष्य के निर्णय पर निर्भर करता है। उन्होंने ज्ञान और तकनीक हासिल करने के साथ-साथ उनके उचित इस्तेमाल की समझ विकसित करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि केवल ज्ञान और तकनीकी क्षमता हासिल करना पर्याप्त नहीं है। इनके उपयोग के लिए जरूरी समझ के साथ नैतिक और व्यावहारिक अनुशासन का पालन करना भी महत्वपूर्ण है।
उनके अनुसार, ज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका उपयोग किस उद्देश्य से और किस तरीके से किया जा रहा है। उन्होंने इस संदर्भ में सही निर्णय लेने की क्षमता तथा नैतिक जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण बताया।
विकास, लोकतंत्र और सामाजिक एकता पर भागवत का संदेश
मोहन भागवत के बयानों में सत्ता परिवर्तन के लिए होने वाले आंदोलनों, लोकतांत्रिक विरोध, भारत की मजबूती, संघ को कमजोर करने की कथित कोशिशों और नेपाल की त्रासदी जैसे मुद्दे शामिल रहे। उन्होंने विरोध प्रदर्शनों को लोकतंत्र का हिस्सा बताते हुए उनके उद्देश्य को जनहित और समाधान से जोड़ने की बात कही।
#WATCH नागपुर, महाराष्ट्र: RSS के विजयादशमी समारोह में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, "पश्चिम से एक आंधी चली है जो हर प्रकार की व्यवस्था, भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक और मानवीय संस्कार से विरोध रखती है। उसको नष्ट, भ्रष्ट, उद्ध्वस्त करना चाहती है और प्रगत देश भी उससे तत्र है। अभी दो चार दिनों से जो खबरें आ रही हैं, उसे देख लीजिए। फ्रांस में क्या हो रहा है, अल्बानिया में क्या हो रहा है, बांग्लादेश में क्या हुआ, नेपाल में क्या हुआ? यह सब किया कराया उनका है। निमित्त तो वह कहते हैं कि शासन बदलने से परिस्थिति बदलेगी लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं है। पहले नहीं हुआ है और आज भी नहीं हुआ है। अपने स्वार्थ का पोषण करने वाले पिट्ठू सब जगह प्रभावी रहे; इसके लिए यह कार्यवाहियां सारी दुनिया में चलती है और भारत का बड़ा होना ऐसे कार्रवाई को प्रतिबंध करेगा इसलिए भारत उसका परम लक्ष्य है और भारत में भी ऐसे प्रयास चल रहे हैं। परंतु पिछले दशकों में जिस प्रकार की दृढ़नीति से भारत चला और उतने ही पक्के नेतृत्व ने उसको जिस प्रकार की दृढ़ता से चलाया; उसके चलते और भारत की नई पीढ़ी में खासकर देशाभिमान, अपने देश के लिए कुछ करना है, अपने देश का कुछ वैश्विक दायित्व है; इसका भान जगने के कारण जो समाज का पुरुषार्थ बना, उसके कारण और इनके खेल बंद हो गए। ये आसुरी ताकतें जानती हैं और इसलिए भारत उनका लक्ष्य है... अब समाज बहुत बड़ा है। देश अपना अभी विकास कर रहा है जो पूरा नहीं हुआ तो समस्या रहेगी। समस्या रहती ही है और समस्या के चलते आंदोलन भी होते ही हैं और प्रजातंत्र में आंदोलन होंगे ही मगर आंदोलन किसलिए होने चाहिए? आंदोलन समाधान के लिए होने चाहिए।आंदोलन का उद्देश्य समाधान है तो आंदोलन करने वाला कोई समूह हो या शांति सुव्यवस्था कायम करने के लिए कार्यवाही करने वाला शासन-प्रशासन या राजनीतिक नेतागण हो; अपने एक अखंड समाज में हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन, द्वेष, विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए..." (वीडियो: RSS)
— ANI_HindiNews (@AHindinews) October 20, 2026
उन्होंने राजनीतिक नेताओं, प्रदर्शनकारियों और प्रशासन से संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करने की अपील की। साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में विकास के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाने तथा ज्ञान और तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल की जरूरत पर भी जोर दिया।
साभार: मीडिया रिपोर्ट्स


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