बरेली में शिक्षकों को गोशालाओं के लिए भूसा जुटाने का आदेश वायरल, कार्रवाई की चेतावनी पर मचा विवाद।
उत्तर प्रदेश के बरेली में शिक्षा विभाग का एक वायरल लेटर अब बड़ा विवाद बन गया है. सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को निराश्रित गायों के लिए भूसा जुटाने का लक्ष्य दिए जाने के बाद पूरे जिले में नाराजगी फैल गई है. सोशल मीडिया पर वायरल हुए पत्र में स्कूलों से भूसा दान कराने और लक्ष्य पूरा न होने पर जवाब तलब की बात सामने आने के बाद शिक्षक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया. शिक्षकों का कहना है कि पहले ही उन पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का भारी बोझ है और अब उन्हें गोशालाओं के लिए भूसा इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी दी जा रही है. मामला तूल पकड़ने के बाद विभागीय अधिकारियों ने सफाई दी है कि भूसा दान पूरी तरह स्वैच्छिक है और किसी शिक्षक पर कार्रवाई नहीं होगी.
वायरल लेटर से बढ़ा विवाद, शिक्षकों में नाराजगी
बरेली जिले में उस समय विवाद खड़ा हो गया जब नवाबगंज खंड शिक्षा अधिकारी का एक पत्र सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा. इस पत्र में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों और विद्यालयों से निराश्रित गोवंशों के लिए भूसा दान करने का आग्रह किया गया था. पत्र में यह भी उल्लेख था कि निर्धारित लक्ष्य पूरा न होने पर संबंधित स्कूलों से जवाब तलब किया जाएगा. इसी एक लाइन ने पूरे मामले को गरमा दिया.
वायरल लेटर सामने आते ही जिले भर के शिक्षकों के व्हाट्सऐप ग्रुपों में चर्चा शुरू हो गई. कई शिक्षकों ने इसे शिक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बताया. उनका कहना है कि बच्चों की पढ़ाई छोड़कर उन्हें लगातार दूसरे सरकारी कार्यों में लगाया जा रहा है. अब गोशालाओं के लिए भूसा जुटाने जैसी जिम्मेदारी भी उन पर डाल दी गई है.
शिक्षकों का आरोप है कि शिक्षा विभाग का मूल उद्देश्य स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारना होना चाहिए, लेकिन लगातार नए-नए आदेशों से शिक्षकों का समय गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में खर्च हो रहा है. इससे ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है.
बताया जा रहा है कि जिले में निराश्रित गोवंशों के लिए चारे की कमी को देखते हुए प्रशासन ने विशेष अभियान शुरू किया था. इसके तहत विभिन्न विभागों को भूसा जुटाने की जिम्मेदारी दी गई. इसी क्रम में बेसिक शिक्षा विभाग को भी लक्ष्य सौंपा गया, जिसके बाद यह पूरा विवाद खड़ा हो गया.
1500 कुंतल भूसा जुटाने का मिला लक्ष्य
जानकारी के मुताबिक मुख्य पशु चिकित्साधिकारी की ओर से बेसिक शिक्षा विभाग को कुल 1500 कुंतल भूसा एकत्र करने का लक्ष्य दिया गया था. इसके बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने जिले के 15 खंड शिक्षा अधिकारियों को 100-100 कुंतल भूसा जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी.
ब्लॉक स्तर पर यह लक्ष्य सरकारी स्कूलों में बांटा गया. बताया जा रहा है कि हर विद्यालय से करीब 46 किलो भूसा देने की बात कही गई थी ताकि निर्धारित लक्ष्य समय पर पूरा किया जा सके. हालांकि यह मात्रा सुनने में कम लग रही थी, लेकिन शिक्षकों का कहना है कि मुद्दा मात्रा का नहीं बल्कि जिम्मेदारी का है.
कई शिक्षकों ने कहा कि पहले से ही चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वे, पोर्टल फीडिंग, डेटा एंट्री और अन्य सरकारी योजनाओं का काम लगातार कराया जाता है. ऐसे में स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है. अब यदि भूसा इकट्ठा करने जैसी गतिविधियां भी स्कूलों से कराई जाएंगी तो शिक्षण कार्य और कमजोर होगा.
ग्रामीण क्षेत्रों के कई स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी है. ऐसे में अतिरिक्त काम का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है. कई शिक्षकों ने यह भी कहा कि वे सरकारी कर्मचारी हैं, कोई चंदा संग्रह एजेंसी नहीं.
वायरल लेटर में कथित तौर पर कार्रवाई और जवाब तलब का जिक्र आने के बाद शिक्षकों में और ज्यादा नाराजगी फैल गई. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या अब स्कूलों को शिक्षा के अलावा दूसरे विभागों की जिम्मेदारियां भी निभानी होंगी.
अधिकारियों की सफाई के बाद भी नहीं थमा विवाद
मामला बढ़ने के बाद विभागीय अधिकारियों ने सफाई देना शुरू किया. मीरगंज के खंड शिक्षा अधिकारी अवनीश कुमार ने कहा कि जिला प्रशासन के निर्देश पर शिक्षकों को केवल सहयोग के लिए कहा गया था. उन्होंने स्पष्ट किया कि भूसा दान पूरी तरह स्वैच्छिक है और किसी भी शिक्षक पर दबाव नहीं बनाया जाएगा.
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा कहीं नहीं लिखा गया कि भूसा न देने पर कार्रवाई होगी. हालांकि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पत्र में जवाब तलब जैसी बातों के कारण विवाद बढ़ गया.
वहीं नवाबगंज के खंड शिक्षा अधिकारी ने फोन पर बताया कि पत्र में हुई भाषा संबंधी गलती को लेकर खंडन जारी किया गया है. उन्होंने कहा कि किसी भी शिक्षक पर कार्रवाई नहीं की जाएगी और दान पूरी तरह इच्छा पर आधारित रहेगा.
इसके बावजूद शिक्षक संगठनों में नाराजगी कम होती नहीं दिख रही. कई शिक्षक नेताओं ने कहा कि प्रशासन को ऐसे आदेश जारी करने से पहले शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने वाले असर के बारे में सोचना चाहिए. उनका कहना है कि सरकारी स्कूलों में पहले ही संसाधनों और स्टाफ की कमी है, ऊपर से लगातार अतिरिक्त कार्य दिए जा रहे हैं.
टीचर सत्येंद्र पाल सिंह ने कहा कि शिक्षकों को उनके मूल कार्य से हटाकर अलग-अलग सरकारी कामों में लगाया जा रहा है. उन्होंने बताया कि इस समय जनगणना के कार्य में भी बड़ी संख्या में शिक्षक लगाए गए हैं. इससे पहले कई शिक्षकों को दूसरे सर्वे और प्रशासनिक कामों में लगाया गया था.
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा अब राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बन गया है. कुछ लोग इसे गोसेवा से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कई लोग इसे शिक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ बता रहे हैं. लोगों का कहना है कि अगर गोशालाओं के लिए चारे की जरूरत है तो उसके लिए अलग बजट और व्यवस्था होनी चाहिए, न कि स्कूलों और शिक्षकों पर निर्भरता बढ़ाई जाए.
फिलहाल विभागीय सफाई के बाद भी वायरल लेटर को लेकर विवाद शांत होता नजर नहीं आ रहा. शिक्षकों के बीच यह चर्चा लगातार जारी है कि आखिर स्कूलों की प्राथमिकता पढ़ाई होगी या फिर दूसरे सरकारी अभियान. आने वाले दिनों में यह मामला और ज्यादा तूल पकड़ सकता है, क्योंकि शिक्षक संगठन इस मुद्दे को लेकर आगे रणनीति बनाने की तैयारी में जुट गए हैं.



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