छत्तीसगढ़ में टीचर की पिटाई से 7वीं के छात्र के कान 80% डैमेज, 9 महीने बाद गिरफ्तारी, परिवार ने उठाए गंभीर सवाल
मामूली देरी पर टूटा कहर, क्लासरूम बना डर का मैदान
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ से सामने आया यह मामला शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जहां एक शिक्षिका की गुस्से भरी हरकत ने एक मासूम छात्र की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। घटना 2 जुलाई 2025 की बताई जा रही है, जब खालसा पब्लिक स्कूल में कक्षा 7वीं के छात्र सार्थक सहारे अपनी क्लास में मौजूद था।
बताया जा रहा है कि सोशल साइंस की क्लास के दौरान शिक्षिका प्रियंका सिंह ने छात्र को किताब निकालने के लिए कहा, लेकिन बैग में किताब खोजने में कुछ सेकंड की देरी हो गई। इसी छोटी सी बात पर शिक्षिका का गुस्सा अचानक भड़क उठा और उन्होंने बिना किसी चेतावनी के छात्र के कानों पर लगातार कई जोरदार थप्पड़ मार दिए।
क्लासरूम में मौजूद अन्य छात्र इस घटना से सहम गए, लेकिन किसी ने भी उस समय विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटाई। यह घटना न सिर्फ एक छात्र के लिए, बल्कि पूरे स्कूल के माहौल के लिए डरावनी बन गई।
“मैं सुन नहीं पा रहा…” घर पहुंचते ही सामने आया खौफनाक सच
पिटाई के बाद जब सार्थक घर पहुंचा, तो उसकी हालत सामान्य नहीं थी। उसने अपनी मां को बताया कि उसे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है। शुरुआत में परिवार को लगा कि शायद यह अस्थायी समस्या होगी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, स्थिति और गंभीर होती चली गई।
परिजन तुरंत उसे डोंगरगढ़ के सरकारी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां प्राथमिक जांच के बाद डॉक्टरों ने मामले को गंभीर बताते हुए उसे जिला अस्पताल राजनांदगांव और फिर रायपुर रेफर कर दिया।
डॉक्टरों की विस्तृत जांच में जो सामने आया, उसने परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दी। रिपोर्ट में बताया गया कि थप्पड़ों के कारण छात्र के कान के पर्दे और अंदरूनी नसों को गंभीर नुकसान पहुंचा है, जिससे उसकी सुनने की क्षमता 70 से 80 प्रतिशत तक खत्म हो चुकी है।
डॉक्टरों का खुलासा: चोट इतनी गहरी कि लंबा और महंगा इलाज जरूरी
चिकित्सकों के अनुसार, यह कोई सामान्य चोट नहीं है। कान के अंदरूनी हिस्से को हुए नुकसान के कारण छात्र को लंबे समय तक इलाज की जरूरत होगी। इसमें महंगे उपकरण, दवाइयां और संभवतः सर्जरी भी शामिल हो सकती है।
डॉक्टरों ने यह भी बताया कि इस तरह की चोटें अक्सर स्थायी प्रभाव छोड़ती हैं, जिससे मरीज को पूरी तरह ठीक होना मुश्किल हो सकता है। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित है या नहीं।
9 महीने तक दबाने की कोशिश, परिवार भटकता रहा दर-दर
पीड़ित छात्र के पिता सुधाकर सहारे ने आरोप लगाया है कि स्कूल प्रबंधन ने इस पूरे मामले को दबाने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि घटना के बाद उन्होंने कई बार स्कूल प्रशासन से शिकायत की, लेकिन हर बार उन्हें टाल दिया गया।
परिवार का कहना है कि पिछले 9 महीनों से वे न्याय के लिए भटक रहे थे, लेकिन न तो स्कूल ने कोई ठोस कदम उठाया और न ही शिक्षिका के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई।
इस दौरान बच्चे की हालत लगातार बिगड़ती रही और परिवार आर्थिक व मानसिक दबाव में आता चला गया।
अन्य छात्रों ने भी खोली पोल, पहले भी कर चुकी थी हिंसा
मामले ने नया मोड़ तब लिया जब स्कूल की ही एक अन्य छात्रा ने गवाही दी कि आरोपी शिक्षिका का व्यवहार पहले से ही हिंसक रहा है। उसने बताया कि शिक्षिका कई बार छात्रों के साथ मारपीट कर चुकी हैं और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाती हैं।
इस खुलासे के बाद मामला और गंभीर हो गया और यह साफ हो गया कि यह कोई एक बार की घटना नहीं थी, बल्कि लंबे समय से जारी एक खतरनाक व्यवहार का हिस्सा था।
मीडिया में मामला आते ही हरकत में आई पुलिस, हुई गिरफ्तारी
जब यह मामला मीडिया में सामने आया, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी। डोंगरगढ़ एसडीओपी केसरी नंदन नायक के निर्देश पर पुराने लंबित मामलों की समीक्षा की गई और आरोपी शिक्षिका प्रियंका सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
पुलिस अब इस पूरे मामले में स्कूल प्रबंधन की भूमिका की भी जांच कर रही है। यह देखा जा रहा है कि क्या प्रबंधन ने जानबूझकर इस घटना को छिपाने की कोशिश की और क्या वे भी इस मामले में दोषी हैं।
परिवार की मांग: सिर्फ सजा नहीं, इलाज का पूरा खर्च भी दे स्कूल
सार्थक की मां का कहना है कि यह घटना सिर्फ एक सजा का मामला नहीं है, बल्कि उनके बच्चे के भविष्य पर सीधा हमला है। उन्होंने मांग की है कि आरोपी शिक्षिका को सख्त सजा दी जाए और स्कूल प्रबंधन बच्चे के इलाज का पूरा खर्च उठाए।
परिवार का यह भी कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई की जाती, तो शायद उनके बच्चे की हालत इतनी खराब नहीं होती। अब वे चाहते हैं कि इस मामले में न्याय मिले ताकि भविष्य में किसी और बच्चे के साथ ऐसा न हो।


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