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क्रेडिट कार्ड स्वाइप करते ही कट जाते हैं पैसे, जानिए दुकानदार की जेब तक क्यों नहीं पहुंचती पूरी रकम और क्या है MDR का खेल?



क्रेडिट कार्ड स्वाइप पर कटने वाले MDR का पूरा गणित समझें। जानिए दुकानदार को कम रकम क्यों मिलती है और UPI पर क्या नया नियम आ सकता है।

​जब भी आप दुकान पर क्रेडिट या डेबिट कार्ड स्वाइप करते हैं, तो आपके खाते से कटी पूरी रकम व्यापारी को नहीं मिलती। दरअसल, लेनदेन पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के कारण एक तय हिस्सा बैंकों और कार्ड नेटवर्क के खाते में चला जाता है। भारत में क्रेडिट कार्ड पर 1 से 3 फीसदी तक MDR कटता है। वहीं अब सरकार 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई मर्चेंट भुगतानों पर भी शुल्क लगाने पर विचार कर रही है।

कार्ड स्वाइप होते ही किन चार पक्षों में बंटती है व्यवस्था?

​जब भी कोई उपभोक्ता वीजा, मास्टरकार्ड या रुपे क्रेडिट कार्ड से भुगतान करता है, तो पूरी प्रक्रिया में मुख्य रूप से चार पक्ष जुड़े होते हैं:

  • ग्राहक: जो खरीदारी करने के बाद भुगतान करता है।
  • इश्यूइंग बैंक: ग्राहक का वह बैंक जिसने कार्ड जारी किया है (जैसे भारतीय स्टेट बैंक या एचडीएफसी बैंक)।
  • कार्ड नेटवर्क: पेमेंट रूट करने वाली कंपनी, जैसे वीजा, मास्टरकार्ड या रुपे।
  • एक्वायरिंग बैंक: दुकानदार का खाता जिस बैंक में होता है, जो पेमेंट प्रोसेस कर व्यापारी के खाते में फंड ट्रांसफर करता है।

3,000 के बिल पर व्यापारी को 2,940 रुपये क्यों? समझिए हिसाब

​इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझा जा सकता है। लखनऊ के लुलु मॉल में विवेक अपने परिवार के साथ खरीदारी करने पहुंचे। उन्होंने बच्चों के खिलौने और प्रसाधन का सामान खरीदा, जिसका कुल बिल 3,000 रुपये बना। विवेक ने अपने क्रेडिट कार्ड को स्वाइप कर पिन दर्ज किया और भुगतान सफल हो गया।

​हालांकि, दुकानदार के खाते में पूरी राशि आने के बजाय सिर्फ 2,940 रुपये ही जमा हुए। बाकी के 60 रुपये मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR के तहत कट गए। यह कटौती व्यापारी और बैंक के बीच हुए समझौते के आधार पर तय होती है। अगर MDR 2 फीसदी तय है, तो यह रकम तीन चरणों में कटती है—पहले इश्यूइंग बैंक को हिस्सा जाता है, फिर कार्ड नेटवर्क को और अंत में दुकानदार के बैंक को। इसके बाद शेष रकम व्यापारी के खाते में क्रेडिट होती है।

MDR के तीन हिस्से: सबसे ज्यादा कमाई किसकी?

​भारत में आमतौर पर क्रेडिट कार्ड पर MDR की दर 1% से 3% के बीच रहती है, जबकि डेबिट कार्ड के लिए यह दायरा 0.25% से 1% तक सीमित है। इस पूरे शुल्क को तीन मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है:

  • इंटरचेंज फीस: यह MDR का सबसे बड़ा हिस्सा होता है, जो कुल शुल्क का लगभग 70 से 80 फीसदी बैठता है। यह राशि सीधे कार्ड जारी करने वाले बैंक (इश्यूइंग बैंक) की जेब में जाती है।
  • स्कीम या असेसमेंट फीस: यह हिस्सा कार्ड नेटवर्क कंपनियों (Visa, Mastercard या RuPay) को तकनीकी प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने के एवज में मिलता है।
  • एक्वायरर मार्कअप: यह दुकानदार के बैंक या संबंधित पेमेंट गेटवे की कमाई होती है। यही एकमात्र ऐसा हिस्सा है जिस पर मर्चेंट बैंक के साथ मोलभाव कर सकता है।

2,000 रुपये से अधिक के UPI पेमेंट पर क्या है सरकार की योजना?

​फिलहाल यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर व्यक्ति से मर्चेंट (P2M) भुगतानों पर शून्य MDR व्यवस्था लागू है। इससे छोटे व्यापारियों को कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ता और इसकी भरपाई के लिए सरकार बैंकों व पेमेंट कंपनियों को सालाना इंसेंटिव देती है।

​अब सरकार 2,000 रुपये से अधिक के कारोबारी UPI ट्रांजैक्शन पर 0.25% से 0.4% तक MDR लगाने की संभावना तलाश रही है। हालांकि, यह व्यवस्था केवल बड़े व्यावसायिक भुगतानों पर ही लागू करने की तैयारी है। आम उपभोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले रोजमर्रा के छोटे भुगतानों और व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांसफर पर कोई चार्ज नहीं लगेगा। सरकार ने अभी तक इस प्रस्ताव को लागू करने की तारीख और अंतिम दरों पर कोई औपचारिक मुहर नहीं लगाई है।

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