हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने से पहले कैशलेस, रूम रेंट, को-पेमेंट, सब-लिमिट और वेटिंग पीरियड जरूर जांचें।
आज के समय में बढ़ते इलाज खर्च के बीच हेल्थ इंश्योरेंस परिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा का जरिया बन गया है। लेकिन सिर्फ कम प्रीमियम और ज्यादा बीमा राशि देखकर पॉलिसी खरीदना नुकसानदायक हो सकता है। कैशलेस सुविधा, रूम रेंट लिमिट, को-पेमेंट, सब-लिमिट, वेटिंग पीरियड और पुरानी बीमारी से जुड़ी शर्तों को समझना जरूरी है, क्योंकि क्लेम के समय इन्हीं का सीधा असर पड़ सकता है।
सिर्फ प्रीमियम और बीमा राशि देखकर न खरीदें पॉलिसी
हेल्थ इंश्योरेंस खरीदना अब पहले की तुलना में आसान हो गया है। ऑनलाइन माध्यम से लोग अलग-अलग पॉलिसी देख सकते हैं, अपनी जरूरत के मुताबिक कवर चुन सकते हैं और भुगतान करके पॉलिसी हासिल कर सकते हैं। लेकिन आसान प्रक्रिया के कारण कई बार लोग पॉलिसी के नियम और शर्तों को ठीक से नहीं पढ़ते।
पॉलिसी में दर्ज छोटी-छोटी शर्तें अस्पताल में भर्ती होने के समय महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं। इसलिए किसी पॉलिसी का चुनाव करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि उसमें 5 लाख या 10 लाख रुपये का कवर मिल रहा है। यह भी समझना जरूरी है कि उस कवर के तहत किन खर्चों का भुगतान होगा और किन पर सीमा या दूसरी शर्तें लागू हैं।
कैशलेस सुविधा का मतलब पूरा बिल मुफ्त होना नहीं
हेल्थ इंश्योरेंस में कैशलेस सुविधा को लेकर अक्सर गलतफहमी होती है। कैशलेस का अर्थ यह नहीं है कि अस्पताल में इलाज के दौरान आपको अपनी जेब से कोई रकम नहीं देनी होगी।
कैशलेस व्यवस्था में पॉलिसी के तहत कवर होने वाले खर्च का भुगतान बीमा कंपनी और अस्पताल के बीच किया जा सकता है। लेकिन अस्पताल का हर खर्च पॉलिसी के तहत कवर हो, यह जरूरी नहीं है।
मसलन, दस्ताने, सिरिंज, मास्क, PPE किट और कुछ अन्य Consumables का खर्च पॉलिसी में शामिल नहीं हो सकता। इसी तरह किसी इलाज के लिए अस्पताल द्वारा लिया गया ऐसा अतिरिक्त शुल्क, जिसे पॉलिसी के नियम उचित खर्च के तौर पर स्वीकार नहीं करते, उसका कुछ हिस्सा भी मरीज को अपनी जेब से देना पड़ सकता है।
इसलिए केवल कैशलेस सुविधा देखकर यह मान लेना सही नहीं है कि अस्पताल का पूरा बिल बीमा कंपनी ही चुकाएगी।
Room Rent की लिमिट को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय कमरे के किराये की सीमा यानी Room Rent Limit को ध्यान से देखना भी जरूरी है। पॉलिसी में कमरे के किराये के लिए एक निश्चित सीमा निर्धारित हो सकती है।
अगर आपकी पॉलिसी में कमरे के किराये की एक तय सीमा है और आप उससे महंगा कमरा चुनते हैं, तो इसका असर केवल कमरे के अतिरिक्त किराये तक सीमित नहीं रह सकता। अस्पताल के कुछ अन्य खर्चों में भी कटौती हो सकती है। इसे Proportionate Deduction कहा जाता है।
यही वजह है कि पॉलिसी खरीदते समय कमरे के किराये की सीमा को पहले ही समझ लेना जरूरी है। इससे अस्पताल में भर्ती होने के बाद संभावित अतिरिक्त भुगतान को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट रहती है।
रोबोटिक सर्जरी जैसे इलाज पर भी हो सकती है अलग सीमा
किसी पॉलिसी की कुल बीमा राशि अधिक होने का मतलब यह नहीं है कि हर तरह के इलाज पर उतनी ही राशि उपलब्ध होगी। कुछ पॉलिसियों में नई तकनीक से किए जाने वाले उपचार के लिए अलग सीमा निर्धारित हो सकती है।
रोबोटिक सर्जरी जैसे इलाज के लिए भी कुछ पॉलिसियों में अलग लिमिट हो सकती है। इसलिए पॉलिसी खरीदते समय कुल Sum Insured के साथ-साथ अलग-अलग इलाज और सुविधाओं पर लागू सीमाओं को भी देखना चाहिए।
एजेंट की बात के बजाय पॉलिसी दस्तावेज देखें
पॉलिसी खरीदते समय एजेंट आपको उसके कवरेज और सुविधाओं के बारे में जानकारी दे सकता है। लेकिन केवल मौखिक रूप से बताई गई बातों के आधार पर पॉलिसी लेना उचित नहीं है।
क्लेम के समय सबसे महत्वपूर्ण यह होता है कि पॉलिसी के दस्तावेजों में संबंधित शर्त क्या लिखी गई है। इसलिए एजेंट द्वारा बताई गई सुविधाओं और कवरेज को पॉलिसी के दस्तावेजों में जरूर जांचें।
अगर किसी खास बीमारी, इलाज या सुविधा के कवर को लेकर कोई सवाल है, तो उसके बारे में लिखित रूप में स्पष्ट जानकारी लेना बेहतर है। इससे बाद में कवरेज को लेकर होने वाली उलझन से बचने में मदद मिल सकती है।
पुरानी बीमारी की जानकारी छिपाना पड़ सकता है महंगा
पॉलिसी लेते समय अपनी मेडिकल हिस्ट्री की सही जानकारी देना बेहद जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति को पहले से BP, डायबिटीज या थायरॉयड जैसी बीमारी है, तो इसकी जानकारी बीमा लेते समय सही तरीके से देनी चाहिए।
कुछ लोग प्रीमियम बढ़ने या पॉलिसी मिलने में परेशानी के डर से पुरानी बीमारी की जानकारी नहीं देते। लेकिन बाद में क्लेम के दौरान अस्पताल के रिकॉर्ड से पुरानी बीमारी की जानकारी सामने आ सकती है।
ऐसी स्थिति में क्लेम को लेकर विवाद हो सकता है और बीमा कंपनी पॉलिसी में मौजूद नियमों के आधार पर कार्रवाई कर सकती है। इसलिए पॉलिसी खरीदते समय अपनी मेडिकल हिस्ट्री से संबंधित जानकारी सही तरीके से देना जरूरी है।
सबसे कम प्रीमियम वाली पॉलिसी हमेशा बेहतर नहीं
ऑनलाइन हेल्थ इंश्योरेंस देखते समय कम प्रीमियम वाला प्लान आकर्षक लग सकता है। लेकिन केवल कम कीमत के आधार पर पॉलिसी चुनना सही नहीं है। कम प्रीमियम वाली पॉलिसी में ऐसी शर्तें हो सकती हैं, जिनका असर भविष्य में क्लेम के समय दिखाई दे।
इनमें को-पेमेंट, सब-लिमिट और वेटिंग पीरियड जैसी शर्तें शामिल हो सकती हैं। को-पेमेंट का मतलब है कि क्लेम की कुछ राशि बीमित व्यक्ति को अपनी जेब से देनी होगी।
वहीं सब-लिमिट का अर्थ है कि किसी खास बीमारी या इलाज के लिए बीमा कंपनी ने अधिकतम भुगतान की अलग सीमा निर्धारित की है। दूसरी ओर, वेटिंग पीरियड के तहत कुछ बीमारियों के इलाज का खर्च एक निश्चित अवधि पूरी होने के बाद ही पॉलिसी में शामिल हो सकता है।
इसलिए पॉलिसी खरीदते समय प्रीमियम के साथ-साथ इन सभी शर्तों और वास्तविक कवरेज को समझना जरूरी है।
पॉलिसी खरीदने से पहले इन बातों को समझें
हेल्थ इंश्योरेंस परिवार को इलाज के बढ़ते खर्च से आर्थिक सुरक्षा देने में मदद कर सकता है, लेकिन इसके लिए पॉलिसी का सही चुनाव जरूरी है। पॉलिसी लेने से पहले कैशलेस सुविधा, Room Rent Limit, इलाज से जुड़ी सब-लिमिट, वेटिंग पीरियड और को-पेमेंट जैसी शर्तों को ध्यान से पढ़ना चाहिए।
इसके साथ ही बीमारी और मेडिकल हिस्ट्री से संबंधित जो भी जानकारी बीमा कंपनी को देनी है, उसे पूरी और सही तरीके से देना चाहिए। पॉलिसी खरीदते समय की गई थोड़ी सी सावधानी बाद में क्लेम के समय महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।


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