NEET-UG पेपर लीक विवाद में भारी विरोध के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। CJP के अभिजीत दीपके की बड़ी जीत।
NEET-UG पेपर लीक मामले में लगातार हो रहे भारी विरोध-प्रदर्शनों के बाद अंततः केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर इस छात्र आंदोलन का नेतृत्व 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने किया। महज दो महीने पहले बनी इस पार्टी और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के 26 दिनों के अनशन ने सरकार पर भारी दबाव बनाया। यह इस्तीफा न सिर्फ छात्रों और जेन-जी (Gen-Z) की बड़ी जीत है, बल्कि विपक्ष के लिए भी एक बड़ा सबक है कि मजबूत इरादे से सरकार को भी झुकाया जा सकता है।
मीम से बनी पार्टी ने कर दिखाया बड़ा कारनामा
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की शुरुआत इसी साल 15 मई को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद हुई थी। शुरुआत में यह महज एक मीम की तरह था। अभिजीत दीपके ने इसे "आलसी और बेरोजगारों की आवाज" बताते हुए एक वेबसाइट लॉन्च की थी। इसमें शामिल होने की योग्यता बेरोजगार, हमेशा ऑनलाइन रहने वाला और प्रोफेशनली बकवास करने में सक्षम होना तय की गई थी। हालांकि, NEET-UG विवाद गहराने के बाद जून की शुरुआत में दीपके भारत लौट आए और जंतर-मंतर पर इस व्यंग्यात्मक पहल ने एक गंभीर आंदोलन का रूप ले लिया। दीपके ने अपनी ऑनलाइन लोकप्रियता को जमीनी समर्थन में बदलकर सभी को हैरान कर दिया।
अभिजीत दीपके बोले- 'झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए'
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इसे छात्रों की एकजुटता का परिणाम बताया। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "हमने कर दिखाया। धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है। यह इस्तीफा इस बात का सबूत है कि अगर आप लोग डरते नहीं हैं, अगर आप लोग इस सरकार के आगे नहीं झुकते हैं, तो हम किसी का भी इस्तीफा ले सकते हैं।"
सोनम वांगचुक के 26 दिन के अनशन ने बदली तस्वीर
इस आंदोलन को सही दिशा और राष्ट्रीय पहचान दिलाने में क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूमिका बेहद अहम रही। जब सरकार प्रदर्शनकारियों से बात करने से कतरा रही थी, तब वांगचुक हाथ में गुलाब का फूल लेकर जंतर-मंतर पहुंचे थे। उनकी 26 दिनों की भूख हड़ताल ने आंदोलन को एक नई ऊर्जा दी और मीडिया का ध्यान केंद्रित रखा। हालांकि, गुरुवार रात को जब अस्पताल में दो केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में उनका अनशन खत्म हुआ, तब वहां CJP का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। इसके चलते केंद्र के साथ समझौते के आरोपों के बीच कुछ सवाल भी खड़े हुए।
12 साल में पहली बार विरोध के दबाव में किसी मंत्री का इस्तीफा
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ घटना माना जा रहा है। 2014 में सत्ता में आने के बाद से NDA सरकार का रुख इस्तीफों को लेकर बेहद सख्त रहा है। एक समय जब कांग्रेस ललित मोदी मामले में भाजपा नेताओं के इस्तीफे मांग रही थी, तब राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कहा था, "यहां मंत्री इस्तीफा नहीं देते। यह UPA नहीं है; यह NDA है।"
UPA के दोनों कार्यकालों में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के कारण कई मंत्रियों ने इस्तीफे दिए थे, लेकिन पिछले 12 सालों में तमाम विवादों के बावजूद विपक्ष किसी भी मंत्री का इस्तीफा नहीं ले सका था। 2021 के कोविड संकट के बाद स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का पद से हटना भी एक बड़े कैबिनेट फेरबदल का हिस्सा था, जिसमें 12 मंत्रियों की छुट्टी हुई थी, न कि किसी आंदोलन का सीधा परिणाम। ऐसे में जो काम कई राजनीतिक दल सालों में नहीं कर सके, वह CJP के छात्रों ने महज दो महीने में कर दिखाया।
साभार: मीडिया रिपोर्ट्स


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