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धर्मेंद्र प्रधान ने आखिर क्यों छोड़ी शिक्षा मंत्री की कुर्सी? 36 दिन के आंदोलन के बाद इस्तीफा, इन 5 वजहों ने बढ़ाया दबाव!



NEET विवाद और छात्र आंदोलन के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। जानिए किन 5 वजहों से उन पर लगातार दबाव बढ़ा।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों के लंबे विरोध-प्रदर्शन और NEET पेपर लीक विवाद के बीच अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू होने के करीब 36 दिन बाद आए इस फैसले के पीछे छात्रों और विपक्ष की लगातार मांग, संसद से सड़क तक बढ़ता विरोध, विवाद को संभालने में कथित नाकामी, छात्र नेताओं से संवाद की कमी और परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठे सवाल प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।

जंतर-मंतर आंदोलन के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देते हुए प्रधान ने जंतर-मंतर पर बनी परिस्थितियों का जिक्र किया और कहा कि युवाओं का भविष्य प्रभावित न हो तथा वे कानूनी पेचीदगियों में न फंसें, इसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने पद छोड़ने का फैसला किया है।

धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय से नरेंद्र मोदी सरकार का हिस्सा रहे हैं। वह 2014 से केंद्र सरकार में मंत्री थे और शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने से पहले पेट्रोलियम तथा इस्पात जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार भी संभाल चुके हैं।

हालांकि, NEET पेपर लीक विवाद के बाद शिक्षा मंत्रालय और धर्मेंद्र प्रधान लगातार सवालों के घेरे में आते गए। छात्रों का आंदोलन तेज होने के साथ उनके इस्तीफे की मांग भी जोर पकड़ती गई और आखिरकार उन्होंने शिक्षा मंत्री का पद छोड़ने का फैसला किया।

पहली वजह: छात्र संगठन और विपक्ष इस्तीफे की मांग पर अड़े

धर्मेंद्र प्रधान पर बढ़ते दबाव की सबसे बड़ी वजह जंतर-मंतर पर जारी छात्र आंदोलन माना जा रहा है। आंदोलन का नेतृत्व कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) लगातार यह मांग कर रही थी कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बिना आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा।

शुक्रवार को CJP की ओर से सौरव दास और आशुतोष रांका ने केंद्र सरकार के मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह से बातचीत की थी। इस बातचीत में प्रदर्शनकारी पक्ष ने साफ कर दिया था कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उनकी प्रमुख मांग है और इसके पूरा हुए बिना प्रदर्शन खत्म नहीं होगा।

छात्रों के साथ विपक्ष भी इस मुद्दे पर सरकार पर दबाव बना रहा था। शनिवार को प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ 10 जनपथ के बाहर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई।

इस तरह छात्र आंदोलन के साथ राजनीतिक दबाव भी बढ़ता चला गया और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा पूरे विवाद के केंद्र में आ गया।

दूसरी वजह: संसद से सड़क तक बढ़ता गया विरोध

धर्मेंद्र प्रधान के लिए मुश्किल केवल जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही। इस मुद्दे की गूंज संसद तक पहुंच गई और सदन की कार्यवाही भी लगातार प्रभावित हुई।

संसद की कार्यवाही 20 जुलाई से शुरू हुई थी, लेकिन इसके बाद पांच दिनों तक धर्मेंद्र प्रधान और छात्रों से जुड़े मुद्दे पर हंगामा होता रहा। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विरोध के कारण सामान्य कामकाज प्रभावित हुआ।

दूसरी ओर, दिल्ली में शुरू हुआ छात्र विरोध दूसरे राज्यों तक पहुंचने लगा। बिहार में शनिवार को पटना और सीवान जैसे शहरों में प्रदर्शन देखने को मिला। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में भी छात्रों ने विरोध शुरू कर दिया।

विरोध का दायरा बढ़ने के साथ सरकार के सामने इस विवाद को शांत करने की चुनौती भी बड़ी होती गई। संसद के भीतर विपक्ष का दबाव और बाहर छात्रों का प्रदर्शन एक साथ जारी रहने से मामला लगातार राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता गया।

तीसरी वजह: NEET विवाद में डैमेज कंट्रोल नहीं कर पाने के आरोप

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की वजहों में NEET पेपर लीक विवाद को संभालने के तरीके पर उठे सवाल भी शामिल रहे। 3 मई को NEET पेपर लीक का मामला सामने आने के बाद छात्रों में नाराजगी बढ़ी और धीरे-धीरे मामला बड़े विरोध-प्रदर्शन में बदल गया।

आरोप लगाया गया कि शुरुआती दौर में सरकार की ओर से विरोध को पर्याप्त गंभीरता नहीं मिली। बाद में आंदोलन बढ़ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को छात्रों से अपील करनी पड़ी और पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून की बात सामने आई।

इस दौरान धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए। आंदोलन के बीच उनके स्तर से छात्रों के साथ संवाद नहीं होने को लेकर आलोचना हुई। विवाद बढ़ने के साथ शिक्षा मंत्रालय और मंत्री दोनों पर राजनीतिक दबाव बढ़ता चला गया।

यही वजह रही कि NEET विवाद केवल परीक्षा और पेपर लीक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही और नेतृत्व को लेकर भी सवाल उठने लगे।

चौथी वजह: छात्र नेताओं से संवाद नहीं होने पर उठे सवाल

धर्मेंद्र प्रधान के रवैये को लेकर भी आंदोलन के दौरान लगातार सवाल उठे। NEET पेपर लीक विवाद के बाद छात्र नेताओं के साथ सीधी बातचीत नहीं होने को उनके खिलाफ बढ़ते असंतोष की एक वजह बताया गया।

इस संदर्भ में फरवरी 2025 में चंडीगढ़ में किसानों के प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन का उदाहरण भी सामने रखा गया। उस समय केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी टीम के साथ चंडीगढ़ पहुंचे थे और बातचीत के जरिए विवाद को सुलझाने की कोशिश की थी।

इसके विपरीत NEET विवाद में धर्मेंद्र प्रधान और आंदोलनकारी छात्र नेताओं के बीच संवाद की कमी बनी रही। जैसे-जैसे प्रदर्शन लंबा चला, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बनती चली गई।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन लंबा खिंचने और विपक्ष के भी इस मांग के समर्थन में आने के बाद सरकार पर समाधान तलाशने का दबाव लगातार बढ़ता गया।

पांचवीं वजह: 2024 के NEET विवाद और NTA को लेकर भी उठे सवाल

धर्मेंद्र प्रधान के सामने मौजूदा विवाद के अलावा 2024 में NEET को लेकर सामने आए विवाद का मुद्दा भी था। उस समय भी धर्मेंद्र प्रधान ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री थे।

2024 के विवाद के बाद सरकार ने इसरो के वैज्ञानिक राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। समिति को परीक्षा व्यवस्था में सुधार और पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के उपाय सुझाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

समिति ने अपनी सिफारिशें दीं, लेकिन आरोप लगाया गया कि इन सुझावों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया। इसी के साथ नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के कामकाज और कथित लापरवाही को लेकर भी शिक्षा मंत्रालय पर सवाल उठे।

मौजूदा NEET पेपर लीक विवाद सामने आने के बाद पुराने सवाल भी दोबारा चर्चा में आ गए। इससे शिक्षा मंत्री पर जवाबदेही का दबाव और बढ़ गया।

2014 से केंद्र सरकार में मंत्री रहे धर्मेंद्र प्रधान

धर्मेंद्र प्रधान नरेंद्र मोदी सरकार में लंबे समय से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं। वह 2014 से केंद्र सरकार में मंत्री थे और शिक्षा मंत्रालय से पहले पेट्रोलियम तथा इस्पात जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी उनके पास रही।

लेकिन NEET पेपर लीक विवाद के बाद हालात तेजी से बदले। छात्रों का आंदोलन लंबा चलता गया, विपक्ष ने इस्तीफे की मांग तेज कर दी और संसद में भी इस मुद्दे को लेकर लगातार गतिरोध बना रहा।

जंतर-मंतर पर आंदोलन के करीब 36 दिन बाद धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। इस फैसले के साथ पिछले कई सप्ताह से छात्रों के आंदोलन और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बनी उनके इस्तीफे की मांग पूरी हो गई।


साभार: मीडिया रिपोर्ट्स 

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