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बिजली ने तोड़ा यूपी का सिस्टम! 3.70 करोड़ उपभोक्ताओं के बोझ तले दबा इंफ्रास्ट्रक्चर, गर्मी में क्यों ‘फेल’ हो रही योगी सरकार की पावर सप्लाई?


यूपी में भीषण गर्मी के बीच बिजली संकट गहराया। डबल उपभोक्ता, पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ कमी बनी बड़ी वजह।

उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच बिजली संकट ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। राजधानी लखनऊ से लेकर गांवों तक लगातार बिजली कटौती हो रही है। सरकार का दावा है कि बिजली उत्पादन पहले से कई गुना बढ़ चुका है और राज्य में रिकॉर्ड सप्लाई दी जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पुराने और कमजोर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पर बढ़ते लोड का भारी दबाव पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बिजली उपभोक्ताओं की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो गई, जबकि वितरण व्यवस्था लगभग पुराने ढांचे पर ही चल रही है। इसके अलावा हजारों संविदा कर्मचारियों की छंटनी, ट्रांसफार्मर और केबल की खराब स्थिति, लाइनमैन की कमी और ओवरलोडेड सिस्टम ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। यही वजह है कि बिजली खरीदने और उत्पादन बढ़ाने के बावजूद लोगों को घंटों कटौती झेलनी पड़ रही है।

30 हजार मेगावाट की डिमांड ने बढ़ाई सरकार की टेंशन

उत्तर प्रदेश में इस समय भीषण गर्मी पड़ रही है और तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। ऐसे में एयर कंडीशनर, कूलर और अन्य बिजली उपकरणों के इस्तेमाल में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर बिजली की मांग पर पड़ा है। राज्य में बिजली की डिमांड 30 हजार मेगावाट के पार पहुंच चुकी है, जो पिछले वर्षों की तुलना में बेहद ज्यादा मानी जा रही है।

ऊर्जा विभाग के आंकड़ों के अनुसार साल 2012 से 2017 के बीच जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब प्रदेश में बिजली की औसत मांग करीब 13 हजार मेगावाट रहती थी। अब यह मांग 30 हजार मेगावाट तक पहुंच गई है। यानी करीब ढाई गुना वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार का कहना है कि उसने बिजली उत्पादन और खरीद दोनों बढ़ाई हैं, लेकिन अचानक बढ़ी डिमांड की वजह से सिस्टम पर दबाव बढ़ गया है।

जानकारों के मुताबिक सबसे बड़ी समस्या बिजली उत्पादन नहीं बल्कि वितरण नेटवर्क की क्षमता है। उत्पादन केंद्रों से बिजली निकलने के बाद उसे सुरक्षित तरीके से उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए मजबूत ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम की जरूरत होती है। यूपी में यही हिस्सा सबसे कमजोर साबित हो रहा है।

डबल हुए उपभोक्ता, लेकिन सिस्टम नहीं बदला

ऊर्जा मंत्री ने दावा किया कि साल 2017 में प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं की संख्या लगभग 1.80 करोड़ थी, जो अब बढ़कर 3.70 करोड़ तक पहुंच गई है। यानी कुछ ही वर्षों में उपभोक्ताओं की संख्या लगभग दोगुनी हो गई। इसके बावजूद बिजली वितरण का ढांचा उसी अनुपात में मजबूत नहीं किया गया।

बिजली विभाग के अधिकारियों के मुताबिक कई इलाकों में ट्रांसफार्मर और केबल पहले से ही ओवरलोड चल रहे हैं। पहले जिन ट्रांसफार्मरों पर सीमित घरों का लोड था, अब उन्हीं पर दोगुने से ज्यादा कनेक्शन चल रहे हैं। ऐसी स्थिति में जैसे ही गर्मी में बिजली की खपत बढ़ती है, ट्रांसफार्मर गर्म होकर ट्रिप करने लगते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि शहरों के नए विस्तार वाले क्षेत्रों और अनप्लांड कॉलोनियों में समस्या सबसे ज्यादा गंभीर है। यहां बिना पर्याप्त योजना के बड़ी संख्या में बिजली कनेक्शन दे दिए गए, लेकिन उसी हिसाब से लाइनें और ट्रांसफार्मर नहीं लगाए गए। नतीजा यह हुआ कि पूरा सेकेंड्री सिस्टम ओवरलोड हो गया।

बिजली उत्पादन बढ़ा, लेकिन सप्लाई व्यवस्था पिछड़ी

सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि बिजली उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। साल 2017 में प्रदेश का तापीय बिजली उत्पादन लगभग 5160 मेगावाट था, जो अब बढ़कर 9120 मेगावाट तक पहुंच गया है। सरकार इसे और बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है।

इसके बावजूद उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल रही। वजह यह है कि बिजली उत्पादन और सप्लाई दो अलग-अलग चीजें हैं। बिजली पैदा करना पर्याप्त नहीं होता, उसे अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए मजबूत नेटवर्क चाहिए। यूपी में इसी हिस्से में सबसे ज्यादा कमी सामने आ रही है।

पावर ट्रांसमिशन कैपेसिटी की बात करें तो प्रदेश में लंबी दूरी तक सुरक्षित बिजली आपूर्ति की क्षमता लगभग 31,500 मेगावाट बताई जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि अगर इससे ज्यादा लोड डाल दिया जाए तो कई उपकेंद्र ट्रिप कर सकते हैं और बड़े स्तर पर ब्लैकआउट का खतरा पैदा हो सकता है।

गांव से लेकर राजधानी तक बिजली कटौती

प्रदेश में इस समय बिजली कटौती सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है। राजधानी लखनऊ में भी लोग घंटों बिजली गुल रहने की शिकायत कर रहे हैं। कई जिलों में रात के समय बिजली कटौती सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है।

लोगों का आरोप है कि बिजली जाने के बाद घंटों तक कोई सुनवाई नहीं होती। ट्रांसफार्मर खराब होने पर कई-कई घंटे सप्लाई बंद रहती है। गर्मी के कारण छोटे बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों की हालत खराब हो रही है।

बिजली विभाग का कहना है कि कई स्थानों पर तेज आंधी और खराब मौसम की वजह से भी लाइनें प्रभावित हुई हैं। हालांकि स्थानीय लोग इसे विभागीय लापरवाही मान रहे हैं। उनका कहना है कि हर साल गर्मियों में यही हालात बनते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं किया जाता।

30 हजार कर्मचारियों की छंटनी बनी बड़ी वजह

बिजली संकट के पीछे एक और बड़ी वजह कर्मचारियों की कमी को माना जा रहा है। जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने करीब 30 हजार संविदा कर्मचारियों को हटा दिया है। यही कर्मचारी ग्राउंड लेवल पर बिजली व्यवस्था संभालने का काम करते थे।

ट्रांसफार्मर खराब होने, लाइन टूटने, केबल जलने या लोकल फॉल्ट ठीक करने का काम मुख्य रूप से संविदा कर्मचारी और लाइनमैन करते थे। इनके हटने के बाद मरम्मत कार्य प्रभावित होने लगा है। कई जगह मामूली खराबी ठीक करने में घंटों लग जाते हैं।

पूर्व अधिकारियों का कहना है कि इंजीनियर सिर्फ तकनीकी निर्देश दे सकते हैं, लेकिन असली काम लाइनमैन करते हैं। यदि ग्राउंड स्टाफ कम होगा तो बिजली व्यवस्था को सुचारु रखना मुश्किल हो जाएगा।

आईएएस बनाम तकनीकी सिस्टम की बहस तेज

बिजली संकट के बीच अब सिस्टम संचालन को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। विभाग के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि शीर्ष स्तर पर तकनीकी विशेषज्ञों की बजाय प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती ज्यादा हो रही है। इससे तकनीकी समस्याओं का समाधान सही तरीके से नहीं हो पाता।

उनका कहना है कि बिजली विभाग बेहद तकनीकी प्रकृति का होता है। यहां फैसले लेने वाले अधिकारियों को जमीनी तकनीकी अनुभव होना जरूरी है। यदि सिस्टम संचालन में तकनीकी समझ की कमी होगी तो समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकल पाएगा।

बिजली खरीदने के बावजूद क्यों हो रही कमी?

राज्य सरकार ने बढ़ती मांग को देखते हुए बिजली एक्सचेंज से अतिरिक्त बिजली खरीदने का फैसला भी किया। जानकारी के अनुसार हाल ही में करीब 577 मेगावाट बिजली खरीदी गई। इसके बावजूद पीक टाइम में लगभग 850 मेगावाट की कमी दर्ज हुई।

विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या सिर्फ बिजली उपलब्ध कराने की नहीं बल्कि उसे अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाने की है। यदि ट्रांसफार्मर और केबल पहले से ओवरलोड हैं तो अतिरिक्त बिजली खरीदने का भी ज्यादा फायदा नहीं होगा।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि इस समय पूरे देश में बिजली की मांग बढ़ी हुई है। ऐसे में निजी कंपनियों से अतिरिक्त बिजली खरीदना भी आसान नहीं है। कई बार बाजार में पर्याप्त यूनिट उपलब्ध नहीं होतीं।

अनप्लांड शहरीकरण बना नई चुनौती

यूपी के बड़े शहरों में तेजी से आबादी बढ़ी है। नई कॉलोनियां और अपार्टमेंट तेजी से बने, लेकिन बिजली ढांचे का विस्तार उसी रफ्तार से नहीं हुआ। कई इलाकों में पुराने ट्रांसफार्मर और पतली केबलों पर ही पूरा नया लोड डाल दिया गया।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है यदि समय रहते बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड नहीं किया गया। केवल उत्पादन बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि लोकल वितरण नेटवर्क को मजबूत करना सबसे जरूरी होगा।

बिजली संकट पर सियासत भी तेज

बिजली कटौती को लेकर अब राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे “महाआपदा” करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बिजली व्यवस्था संभालने में विफल साबित हो रही है।

वहीं ऊर्जा मंत्री ने पलटवार करते हुए कहा कि मौजूदा सरकार ने रिकॉर्ड बिजली सप्लाई दी है और पिछली सरकारों की तुलना में कहीं ज्यादा काम हुआ है। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं की संख्या और बिजली मांग दोनों कई गुना बढ़ी हैं, इसलिए चुनौतियां भी बड़ी हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब राज्य में बिजली उत्पादन बढ़ चुका है और सरकार अतिरिक्त बिजली खरीद भी रही है, तब आखिर आम जनता को राहत क्यों नहीं मिल रही। विशेषज्ञों की मानें तो जब तक वितरण व्यवस्था, ट्रांसफार्मर नेटवर्क, केबल सिस्टम और ग्राउंड स्टाफ मजबूत नहीं होंगे, तब तक यूपी में गर्मियों के दौरान बिजली संकट बना रह सकता है।

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