सुरों की रानी बनेगी सियासत की महारानी? मैथिली ठाकुर की BJP में एंट्री से बिहार में सियासी भूचाल, M3 फैक्टर से हिलेगा विपक्ष का किला!





लोकप्रिय लोकगायिका मैथिली ठाकुर की राजनीति में धमाकेदार एंट्री की अटकलों ने बिहार का सियासी पारा चढ़ा दिया है। जानें BJP का M3 प्लान।

मैथिली ठाकुर की राजनीतिक पिच पर एंट्री, संगीत से सियासत तक का सफर

बिहार की राजनीति एक अप्रत्याशित मोड़ लेती दिख रही है, जहां सुर, संगीत और संस्कृति के धागे सियासी ताने-बाने में उलझते नजर आ रहे हैं। लोक संगीत की दुनिया में अपनी मधुर आवाज से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली, मिथिला की बेटी, मैथिली ठाकुर अब राजनीति के अखाड़े में उतरने की तैयारी में हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्ष नेताओं के साथ उनकी हालिया मुलाकातों ने इन अटकलों को हवा दे दी है कि वह आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी का चेहरा बन सकती हैं। यह केवल एक कलाकार का राजनीति में पदार्पण नहीं है, बल्कि इसके पीछे भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है, जिसे 'M3' फैक्टर - यानी महिला, मिथिला और म्यूजिक का नाम दिया जा रहा है। भाजपा, भोजपुरी सिनेस्टार और गायक पवन सिंह के मामले में हुए सियासी नुकसान के बाद, एक साफ-सुथरी और सांस्कृतिक रूप से गहरी जड़ों वाली छवि को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक है, और मैथिली ठाकुर इस भूमिका में सटीक बैठती हैं। उनकी संभावित उम्मीदवारी ने न केवल मिथिलांचल क्षेत्र में, बल्कि पूरे बिहार में एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है, जहां उनके प्रशंसक उत्साहित हैं, तो वहीं कुछ स्थानीय लोग और आलोचक उनके राजनीतिक अनुभव और क्षेत्रीय योगदान पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

भाजपा का 'M3' प्लान: महिला, मिथिला और म्यूजिक का त्रिकोण

भाजपा की रणनीति मैथिली ठाकुर के इर्द-गिर्द तीन प्रमुख स्तंभों पर टिकी है। पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ 'महिला' वोट बैंक है। बिहार की राजनीति में महिला मतदाता एक मूक लेकिन शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरी हैं, जो अक्सर चुनावी परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित करती हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सफलता में महिला मतदाताओं का एक बड़ा योगदान माना जाता है, और भाजपा इस वोट बैंक में अपनी पैठ को और गहरा करना चाहती है। मैथिली ठाकुर, अपनी पारंपरिक और सुसंस्कृत छवि के साथ, ग्रामीण और शहरी महिलाओं के बीच एक मजबूत अपील रखती हैं। उनकी लोकगायकी सीधे तौर पर घर-आंगन से जुड़ी है, जो उन्हें आधी आबादी के साथ एक भावनात्मक संबंध स्थापित करने में मदद करती है। भाजपा का मानना है कि मैथिली की उम्मीदवारी महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए एक शक्तिशाली चुंबक के रूप में काम कर सकती है, जो पारंपरिक राजनीतिक वादों से परे एक सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव प्रदान करेगी।
रणनीति का दूसरा स्तंभ 'मिथिला' कनेक्शन है। मिथिलांचल, बिहार का एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान, भाषा (मैथिली) और ऐतिहासिक विरासत के लिए जाना जाता है, जिसमें माता सीता की जन्मस्थली होने का गौरव भी शामिल है। भाजपा लंबे समय से इस क्षेत्र में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रही है। मैथिली ठाकुर, जो स्वयं मिथिला की धरती से हैं और अपनी गायकी के माध्यम से इस संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं, पार्टी के लिए एक आदर्श प्रतीक हैं। उनके माध्यम से भाजपा न केवल क्षेत्रीय गौरव की भावना को भुनाना चाहती है, बल्कि ब्राह्मण वोट बैंक को भी साधना चाहती है। मिथिलांचल में ब्राह्मण मतदाताओं की एक बड़ी संख्या है, और हाल के दिनों में ऐसी खबरें आई हैं कि इस समुदाय में पार्टी को लेकर कुछ नाराजगी है। मैथिली, जो स्वयं ब्राह्मण समाज से आती हैं, इस समीकरण को भाजपा के पक्ष में मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
तीसरा और सबसे प्रभावी स्तंभ 'म्यूजिक' यानी संगीत है। संगीत की शक्ति सीमाओं को लांघ जाती है और सीधे दिलों तक पहुंचती है। मैथिली ठाकुर की लोकप्रियता किसी एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी आवाज बिहार के हर घर में गूंजती है। सोशल मीडिया और यूट्यूब पर उनके करोड़ों फॉलोअर्स हैं, जो उन्हें एक विशाल और तैयार मंच प्रदान करते हैं। चुनाव आयोग ने भी उनकी इसी लोकप्रियता को पहचानते हुए 2023 में उन्हें बिहार का 'स्टेट आइकन' बनाया था, ताकि वह मतदाता जागरूकता अभियान का चेहरा बन सकें। अब भाजपा इसी लोकप्रियता को वोटों में तब्दील करने की उम्मीद कर रही है। पवन सिंह जैसे कलाकारों के विवादों में घिरने के बाद, भाजपा एक ऐसे चेहरे की तलाश में थी जिसकी छवि बेदाग हो और जो जनता के बीच सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सके। मैथिली ठाकुर इस मानदंड पर पूरी तरह से खरी उतरती हैं।
बेनीपट्टी विधानसभा सीट: क्यों है भाजपा की नजर?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा मैथिली ठाकुर को मधुबनी जिले की बेनीपट्टी विधानसभा सीट से मैदान में उतार सकती है। यह केवल एक संयोग नहीं है। बेनीपट्टी, मिथिलांचल का एक प्रमुख विधानसभा क्षेत्र है और यहां के सामाजिक-राजनीतिक समीकरण मैथिली की उम्मीदवारी के लिए अनुकूल माने जा रहे हैं। भाजपा के बिहार प्रभारी विनोद तावड़े और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय जैसे वरिष्ठ नेताओं से उनकी मुलाकात इस बात का संकेत है कि पार्टी इस संभावना को लेकर गंभीर है। इन मुलाकातों ने न केवल मैथिली के राजनीतिक प्रवेश की पुष्टि की है, बल्कि यह भी दर्शाया है कि उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन प्राप्त है। खुद मैथिली ने भी सार्वजनिक रूप से अपने गृह क्षेत्र से चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की है, जिससे इन अटकलों को और बल मिला है। भाजपा को उम्मीद है कि मैथिली की व्यक्तिगत लोकप्रियता और 'M3' फैक्टर का संयुक्त प्रभाव उन्हें बेनीपट्टी में एक आसान जीत दिला सकता है, जिसका सकारात्मक असर आसपास की सीटों पर भी पड़ेगा।

हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नया चेहरा

मैथिली ठाकुर की छवि भाजपा के व्यापक हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे में भी सहजता से फिट बैठती है। उनकी गायकी में भक्ति और आध्यात्मिकता का गहरा पुट है। वे अक्सर भगवान शिव, राम और माता सीता के भजन गाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई मौकों पर उनकी गायकी की प्रशंसा की है। चाहे वह दिल्ली में 'नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड्स' समारोह हो, जहां पीएम के अनुरोध पर उन्होंने शिव भजन गाया, या अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दौरान उनके भजनों की सराहना हो, मैथिली को राष्ट्रीय स्तर पर एक सांस्कृतिक ध्वजवाहक के रूप में पहचान मिली है। भाजपा इस छवि को माता सीता के मिथिला कनेक्शन से जोड़कर एक शक्तिशाली नैरेटिव बनाना चाहती है। हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सीतामढ़ी में पुनौरा धाम मंदिर के पुनरुद्धार परियोजना का शिलान्यास इसी दिशा में एक बड़ा कदम था। मैथिली को 'मिथिला की बेटी' और 'सीता की धरती की आवाज' के रूप में प्रस्तुत करके, भाजपा का लक्ष्य मतदाताओं के साथ एक गहरा धार्मिक और भावनात्मक संबंध स्थापित करना है।
क्या राजनीति की राह होगी आसान? स्थानीय विरोध के स्वर
हालांकि मैथिली ठाकुर की लोकप्रियता निर्विवाद है, लेकिन राजनीति का मैदान फूलों की सेज नहीं है। उनके अपने ही क्षेत्र में उनकी संभावित उम्मीदवारी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। एक बड़ा वर्ग मानता है कि एक सफल कलाकार होना एक सफल राजनेता होने की गारंटी नहीं है। आलोचकों का तर्क है कि मैथिली ने अपनी प्रसिद्धि का उपयोग बेनीपट्टी या मिथिला के जमीनी मुद्दों को उठाने के लिए कभी नहीं किया। स्थानीय पत्रकार बिदेश्वर नाथ झा जैसे कई लोगों ने सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी नाराजगी व्यक्त की है। उनका आरोप है कि मैथिली का अपने गांव और क्षेत्र से जुड़ाव केवल सोशल मीडिया पर वीडियो बनाने तक ही सीमित है।
आलोचकों का कहना है कि वह जब भी अपने गांव आती हैं, तो स्थानीय लोगों से दूरी बनाए रखती हैं और अपनी यात्रा को गुप्त रखती हैं। उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कभी भी क्षेत्र के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थलों, जैसे उच्चैठ भगवती स्थान, गिरिजास्थान या महाकवि कालिदास और विद्यापति से जुड़े स्थलों को अपने विशाल फॉलोअर्स बेस के सामने बढ़ावा देने का प्रयास नहीं किया। ये आरोप गंभीर हैं क्योंकि वे सीधे तौर पर उनके क्षेत्रीय जुड़ाव और जनसेवा की भावना पर सवाल उठाते हैं। विरोधियों का कहना है कि केवल लोकप्रियता के आधार पर किसी को अपना प्रतिनिधि चुनना क्षेत्र के विकास के लिए हानिकारक हो सकता है। उनका तर्क है कि एक विधायक को स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ, प्रशासनिक अनुभव और जनता के प्रति समर्पण की आवश्यकता होती है, जो एक कलाकार के पास होना जरूरी नहीं है। यह स्थानीय विरोध मैथिली के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है, क्योंकि उन्हें यह साबित करना होगा कि वह केवल एक 'सेलिब्रिटी उम्मीदवार' नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र के लोगों के प्रति वास्तव में प्रतिबद्ध हैं।

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