ताजा खबरें

5/National/ticker-posts

बड़ी खबरें

Recent/hot-post

अब GPS पर निर्भरता होगी कम! ISRO के NVS-03 सैटेलाइट से NavIC को मिली बड़ी ताकत, सेना से आम लोगों तक क्या बदलेगा?



ISRO के NVS-03 लॉन्च से NavIC मजबूत हुआ। जानें स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक, L1 सिग्नल और सेना व आम लोगों के लिए इसके फायदे।

भारत के स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम NavIC को नई मजबूती मिली है। ISRO ने 30 अक्टूबर की रात GSLV-F18 रॉकेट से 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इसमें स्वदेशी रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक लगाई गई है और यह NavIC में L1 सिग्नल भी जोड़ेगा। इससे भारत की लोकेशन, नेविगेशन और सटीक समय बताने की क्षमता मजबूत होगी। यह तकनीक सेना, ट्रेनों, वाहनों और समुद्री जहाजों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।

ISRO के NVS-03 लॉन्च से भारत के NavIC सिस्टम को क्या फायदा हुआ?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने GSLV-F18 रॉकेट की मदद से NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट को निर्धारित ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया। रॉकेट ने लॉन्च के लगभग 18 मिनट बाद यह उपलब्धि हासिल की। इस मिशन के साथ भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC की परिचालन क्षमता को मजबूती मिली है।

ISRO प्रमुख वी नारायणन के मुताबिक, NVS-03 के प्रक्षेपण से पहले NavIC के तीन सैटेलाइट काम कर रहे थे, जिनमें NVS-01 भी शामिल है। नए सैटेलाइट के जुड़ने से इस सिस्टम को चार सैटेलाइट का न्यूनतम ऑपरेशनल कॉन्फिगरेशन मिल गया है। स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन सेवाओं के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है।

इस उपलब्धि से भारत को अपनी नेविगेशन सेवाओं के संचालन में अधिक आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। खासतौर पर ऐसी परिस्थितियों में स्वदेशी प्रणाली का महत्व बढ़ जाता है, जब किसी विदेशी नेविगेशन सेवा की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

क्या है NavIC और यह GPS से कितना अलग है?

NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। यह भारत का अपना क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है, जिसे आसान भाषा में भारत का GPS भी कहा जा सकता है। हालांकि, दोनों प्रणालियों के सेवा क्षेत्र में बड़ा अंतर है।

GPS का इस्तेमाल दुनिया के विभिन्न हिस्सों में किया जा सकता है, जबकि NavIC को भारत और उसकी सीमा से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक के क्षेत्र के लिए तैयार किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की क्षेत्रीय जरूरतों के लिए स्वतंत्र नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराना है।

NavIC तीन प्रमुख प्रकार की सेवाएं देता है। पहली है पोजिशनिंग, जिसके जरिए किसी व्यक्ति या वस्तु की लोकेशन पता की जा सकती है। दूसरी सेवा नेविगेशन है, जो रास्ते और दिशा की जानकारी देने में मदद करती है। तीसरी सेवा टाइमिंग की है, जिसके माध्यम से सटीक समय का पता लगाया जा सकता है।

इन सेवाओं के लिए सैटेलाइट से सिग्नल प्रसारित किए जाते हैं। जमीन पर मौजूद संगत रिसीवर इन संकेतों को प्राप्त करते हैं और उनकी मदद से किसी व्यक्ति, वाहन, जहाज या अन्य वस्तु की स्थिति और दिशा निर्धारित की जा सकती है।

NVS-03 में लगी स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक क्यों है खास?

NVS-03 की प्रमुख विशेषताओं में स्वदेशी रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक शामिल है। सैटेलाइट नेविगेशन में सटीक समय की अहम भूमिका होती है, क्योंकि सिग्नल के यात्रा समय की गणना के आधार पर लोकेशन निर्धारित करने में मदद मिलती है।

यदि समय की गणना में गड़बड़ी हो, तो लोकेशन की सटीकता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सैटेलाइट में लगी एटॉमिक क्लॉक नेविगेशन सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी घटक है।

NVS-03 की एक अन्य अहम विशेषता L1 सिग्नल का जुड़ना है। यह सैटेलाइट L1, L5 और S बैंड पर सिग्नल भेजने में सक्षम है। L1 सिग्नल के शामिल होने से NavIC की सेवाओं को अतिरिक्त मजबूती मिलने की उम्मीद है।

इस तकनीकी व्यवस्था का उद्देश्य भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम को बेहतर बनाना और विभिन्न उपयोगों के लिए उसकी उपयोगिता बढ़ाना है।

किस कक्षा में स्थापित हुआ NVS-03 सैटेलाइट?

ISRO ने NVS-03 को शुरुआत में जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया। इसकी निर्धारित कक्षा में पृथ्वी से सबसे नजदीकी बिंदु यानी पेरिजी 170 किलोमीटर और सबसे दूर का बिंदु यानी एपोजी 37,023 किलोमीटर है।

इसके बाद सैटेलाइट अपने ऑनबोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से अंतिम जियोसिंक्रोनस कक्षा की ओर बढ़ेगा। इसके लिए 32.5 डिग्री पूर्व की स्थिति निर्धारित की गई है।

सैटेलाइट को तय कक्षा तक पहुंचाने की प्रक्रिया नेविगेशन मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। निर्धारित कक्षा में पहुंचने के बाद सैटेलाइट अपने उद्देश्य के अनुरूप सेवाएं उपलब्ध कराने में भूमिका निभाएगा।

युद्ध की स्थिति में भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है NavIC?

NavIC भारत के लिए केवल लोकेशन बताने वाली तकनीक नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति भी है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अपनी नेविगेशन व्यवस्था होना महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि युद्ध या तनाव की स्थिति में विदेशी नेविगेशन सेवाओं की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

यदि किसी दूसरे देश का नेविगेशन सिस्टम भारत को सेवाएं देना बंद कर दे या उसमें किसी प्रकार की रुकावट आए, तो स्वदेशी व्यवस्था देश को वैकल्पिक सुविधा उपलब्ध करा सकती है। इससे भारत की विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

सेना के लिए पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग की सेवाएं कई कार्यों में उपयोगी हो सकती हैं। इनमें सैन्य वाहनों और युद्धपोतों की स्थिति का पता लगाना, सैनिकों की आवाजाही में सहायता करना और मिसाइलों के नेविगेशन से जुड़े काम शामिल हैं।

इस तरह NavIC भारत की रक्षा संबंधी जरूरतों के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी आधार प्रदान करता है। हालांकि, इसका क्षेत्रीय दायरा भारत और उसके आसपास के लगभग 1,500 किलोमीटर तक सीमित है। इसलिए इसे पूरी दुनिया में इस्तेमाल होने वाले GPS का समान विकल्प नहीं माना जा सकता।

आम लोगों के लिए भी उपयोगी होगा भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम

NavIC की उपयोगिता केवल सेना तक सीमित नहीं है। यह आम नागरिकों से जुड़ी परिवहन और समय संबंधी सेवाओं में भी योगदान दे सकता है।

ISRO प्रमुख वी नारायणन के मुताबिक, इस सिस्टम का इस्तेमाल ट्रेनों, वाहनों और समुद्री जहाजों की रियल टाइम ट्रैकिंग में किया जा सकता है। इससे इन परिवहन साधनों की स्थिति का पता लगाने में सहायता मिल सकती है।

ट्रेन, सड़क परिवहन और समुद्री यातायात जैसे क्षेत्रों में लोकेशन की जानकारी महत्वपूर्ण होती है। NavIC के जरिए उपलब्ध होने वाली नेविगेशन सेवाएं इन क्षेत्रों में ट्रैकिंग की जरूरतों को पूरा करने में उपयोगी हो सकती हैं।

इसके अतिरिक्त, NavIC देश की 'वन नेशन, वन टाइम' पहल से भी जुड़ा है। इस परियोजना का उद्देश्य देश में सटीक और एकसमान भारतीय मानक समय यानी IST की व्यवस्था को मजबूत करना है। इसमें सटीक टाइमिंग सेवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

GSLV-F18 मिशन में भारतीय उद्योगों की भी रही अहम भूमिका

ISRO प्रमुख वी नारायणन ने बताया कि NVS-03 मिशन के दौरान रॉकेट के सभी सिस्टम ने अपेक्षा के अनुरूप काम किया। GSLV ने अपनी 20वीं उड़ान में सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया।

इस मिशन की एक खास बात लगातार दो GSLV मिशनों के बीच केवल 56 दिनों का अंतर रहना भी रही। ISRO प्रमुख ने प्रक्षेपण में भारतीय उद्योगों के योगदान का जिक्र करते हुए बताया कि मिशन के बजट का लगभग 80 फीसदी हिस्सा भारतीय उद्योगों में लगाया गया है।

यह मिशन भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष और नेविगेशन क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। NVS-03 के जुड़ने से NavIC को चार सैटेलाइट का न्यूनतम ऑपरेशनल कॉन्फिगरेशन मिला है और स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक तथा L1 सिग्नल जैसी विशेषताओं से इसकी तकनीकी क्षमता को मजबूती मिली है।

भारत की आत्मनिर्भर नेविगेशन क्षमता को मिलेगी मजबूती

NVS-03 का प्रक्षेपण भारत की अपनी सैटेलाइट नेविगेशन व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अहम उपलब्धि है। NavIC के माध्यम से देश को लोकेशन, रास्ते और सटीक समय की सेवाओं के लिए अपनी प्रणाली पर अधिक भरोसा करने का अवसर मिलता है।

रक्षा जरूरतों से लेकर ट्रेनों, वाहनों और जहाजों की ट्रैकिंग तक, इस सिस्टम के कई संभावित उपयोग हैं। हालांकि, इसकी सेवाएं क्षेत्रीय दायरे तक सीमित हैं, लेकिन भारत की रणनीतिक और नागरिक जरूरतों के लिए इसकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।


साभार: मीडिया रिपोर्ट्स 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ