बरेली में ‘अपहरण’ का ड्रामा निकला झूठ! तीसरी बेटी होने पर पिता ने खुद रची साजिश, 21 दिन की नवजात को चुपचाप दे आया दूसरी महिला को



बरेली में नवजात अपहरण मामला फर्जी निकला, पिता ने तीसरी बेटी होने पर खुद बच्ची को दे दिया, पुलिस जांच में बड़ा खुलासा


बरेली में नवजात अपहरण की खबर से मचा हड़कंप

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में जिला अस्पताल से नवजात बच्ची के कथित अपहरण की खबर ने अचानक पूरे शहर को दहला दिया था। शुक्रवार रात आई इस सूचना ने पुलिस प्रशासन को अलर्ट मोड पर ला दिया और अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। परिजनों की ओर से दावा किया गया कि उनकी 21 दिन की मासूम बच्ची को कोई अज्ञात व्यक्ति अस्पताल से उठा ले गया है। इस घटना ने न केवल स्थानीय लोगों को झकझोर दिया बल्कि अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तुरंत एक्शन लेते हुए कई टीमों को जांच में लगा दिया। आसपास के इलाकों में चेकिंग शुरू कर दी गई और अस्पताल के हर कोने को खंगालना शुरू कर दिया गया। शुरुआती तौर पर मामला बेहद संवेदनशील और चिंताजनक लग रहा था, क्योंकि इसमें एक नवजात बच्ची की सुरक्षा का सवाल जुड़ा था।

पिता की शिकायत से शुरू हुई पूरी कहानी

इज्जतनगर थाना क्षेत्र के परतापुर चौधरी निवासी मकसूद ने डायल 112 पर कॉल कर पुलिस को बताया कि वह अपनी पत्नी शबाना के साथ जिला अस्पताल में अपनी नवजात बच्ची का इलाज कराने आया था। इसी दौरान किसी अज्ञात व्यक्ति ने उनकी बच्ची का अपहरण कर लिया। यह सूचना मिलते ही पुलिस तुरंत हरकत में आ गई और मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी।

मकसूद ने पुलिस को बताया कि वह कुछ देर के लिए अस्पताल परिसर में इधर-उधर गया था और इसी बीच बच्ची गायब हो गई। इस बयान के आधार पर पुलिस ने अस्पताल में मौजूद लोगों से पूछताछ शुरू की और घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू कर दी।

सीसीटीवी फुटेज ने खोली सच्चाई की पहली परत

पुलिस की जांच का सबसे अहम हिस्सा अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे थे। अधिकारियों ने जब फुटेज को ध्यान से खंगाला, तो उन्हें कहीं भी बच्ची के अपहरण जैसा कोई दृश्य नजर नहीं आया। न तो कोई संदिग्ध व्यक्ति बच्ची को ले जाता दिखा और न ही कोई ऐसा संकेत मिला जिससे अपहरण की पुष्टि हो सके।

यहीं से पुलिस को शक होने लगा कि मामला कुछ और ही है। आमतौर पर अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों पर इस तरह की घटनाओं के कुछ न कुछ सुराग मिल ही जाते हैं, लेकिन यहां ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया। इससे जांच का रुख पूरी तरह बदल गया और पुलिस ने परिवार के बयान पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए।

सख्ती से पूछताछ में टूटा पिता का झूठ

जब पुलिस को मामला संदिग्ध लगा तो शहर कोतवाली के इंस्पेक्टर सुरेश कुमार गौतम ने मकसूद से गहन पूछताछ की। शुरुआत में वह अपने बयान पर कायम रहा, लेकिन जैसे-जैसे पुलिस ने सख्ती बढ़ाई और सबूत सामने रखे, उसका झूठ ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया।

आखिरकार मकसूद ने कबूल कर लिया कि उसने अपहरण की पूरी कहानी खुद गढ़ी थी। उसने पुलिस को बताया कि उसकी 21 दिन की नवजात बच्ची का अपहरण नहीं हुआ था, बल्कि उसने खुद ही उसे एक महिला को दे दिया था। यह खुलासा सुनकर पुलिस भी हैरान रह गई।

तीसरी बेटी होने पर लिया गया चौंकाने वाला फैसला

पूछताछ में मकसूद ने जो कारण बताया, वह समाज की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। उसने कहा कि उसके पहले से दो बेटियां हैं और तीसरी बार भी बेटी होने से वह मानसिक और सामाजिक दबाव में था। उसे बेटे की उम्मीद थी, लेकिन जब फिर बेटी हुई तो उसने यह कदम उठा लिया।

मकसूद ने बताया कि आर्थिक तंगी और समाज में लोगों के ताने उसे लगातार परेशान कर रहे थे। उसे लग रहा था कि तीन बेटियों का पालन-पोषण करना उसके लिए मुश्किल होगा। इसी दबाव में आकर उसने अपनी नवजात बच्ची को किसी और को देने का फैसला कर लिया।

बच्ची को सौंपा गया निसंतान महिला को

मकसूद ने पुलिस को बताया कि उसने अपनी बच्ची को बहेड़ी थाना क्षेत्र के शेखूपुर मोहल्ले में रहने वाली शबा बी नाम की महिला को सौंप दिया था। उस महिला की कोई संतान नहीं है और उसके पति लकवे से पीड़ित हैं। इसी वजह से उसने बच्ची को स्वीकार कर लिया।

यह पूरा लेन-देन बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के किया गया था। मकसूद ने बच्ची को चुपचाप उस महिला को दे दिया और बाद में समाज के डर से अपहरण की झूठी कहानी गढ़ दी।

लोकलज्जा के डर से रचा गया अपहरण का ड्रामा

पूछताछ में यह भी सामने आया कि मकसूद और उसकी पत्नी ने यह कदम समाज में बदनामी और लोगों के मजाक से बचने के लिए उठाया था। उन्हें डर था कि अगर वे खुले तौर पर कहेंगे कि उन्होंने अपनी बच्ची किसी को दे दी है, तो लोग उनका मजाक उड़ाएंगे और उन्हें ताने देंगे।

इसी डर ने उन्हें मजबूर किया कि वे पुलिस में झूठी शिकायत दर्ज कराएं और अपहरण की कहानी गढ़ें। यह एक सुनियोजित साजिश थी, जिसमें दोनों पति-पत्नी शामिल थे।

पुलिस ने बच्ची को सकुशल किया बरामद

मामले का खुलासा होते ही पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए बताए गए पते पर पहुंचकर बच्ची को बरामद कर लिया। बच्ची पूरी तरह सुरक्षित मिली, जिससे प्रशासन ने राहत की सांस ली।

इसके बाद पुलिस ने बच्ची को अपने संरक्षण में ले लिया और आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी। अधिकारियों ने बताया कि बच्ची को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के माध्यम से ही उसके माता-पिता को सौंपा जाएगा।

चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की भूमिका और कानूनी प्रक्रिया

इस पूरे मामले में चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी भी नवजात को किसी अन्य व्यक्ति को सौंपना कानूनन अपराध है। इसलिए अब बच्ची की कस्टडी का फैसला भी कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होगा।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि बच्ची की सुरक्षा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए हर कदम उठाया जाएगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि बच्ची को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे और उसका पालन-पोषण सही तरीके से हो।

माता-पिता के खिलाफ एफआईआर की तैयारी

पुलिस ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए मकसूद और उसकी पत्नी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी शुरू कर दी है। उन पर झूठी सूचना देने और पुलिस को गुमराह करने का आरोप लगाया जाएगा।

इंस्पेक्टर सुरेश कुमार गौतम ने बताया कि इस तरह की झूठी घटनाएं पुलिस के समय और संसाधनों की बर्बादी करती हैं, जो अन्य गंभीर मामलों की जांच को प्रभावित करती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई जरूरी है।

मां ने भी कबूली अपनी गलती

पूरे मामले में बच्ची की मां शबाना ने भी अपनी गलती स्वीकार कर ली है। उसने कहा कि लगातार तीसरी बेटी होने के कारण वह भी मानसिक दबाव में थी। उसे बेटे की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उसने यह भी कहा कि समाज के डर और लोगों के तानों से बचने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया। अब उन्हें अपनी गलती का एहसास है और वे इस फैसले पर पछता रहे हैं।

समाज की सोच पर उठे गंभीर सवाल

यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि समाज की उस मानसिकता को भी उजागर करता है जहां आज भी बेटियों को बोझ समझा जाता है। बेटे की चाहत में लोग इस हद तक चले जाते हैं कि अपनी ही संतान को छोड़ने जैसा कठोर कदम उठा लेते हैं।

बरेली की यह घटना यह बताती है कि सामाजिक दबाव और आर्थिक परेशानियां किस तरह इंसान को गलत फैसले लेने पर मजबूर कर देती हैं। यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है, जिनका जवाब समाज को खुद तलाशना होगा।

पुलिस जांच ने बचाई एक मासूम की जिंदगी

अगर पुलिस ने समय रहते इस मामले की गहराई से जांच न की होती, तो शायद यह मामला एक सामान्य अपहरण की घटना बनकर रह जाता और सच्चाई कभी सामने नहीं आ पाती। लेकिन सटीक जांच और तकनीकी सबूतों के आधार पर पुलिस ने पूरे मामले का पर्दाफाश कर दिया।

इस कार्रवाई ने न सिर्फ एक मासूम बच्ची को सुरक्षित वापस लाने में मदद की, बल्कि एक बड़ी साजिश का भी खुलासा किया।

घटना ने छोड़ी गहरी छाप

बरेली की इस घटना ने पूरे इलाके में चर्चा का माहौल बना दिया है। लोग इस बात से हैरान हैं कि कोई पिता सिर्फ बेटी होने की वजह से ऐसा कदम कैसे उठा सकता है। यह घटना समाज के सामने एक आईना भी है, जो दिखाती है कि आज भी कई जगहों पर बेटियों को लेकर सोच में बदलाव नहीं आया है।

यह मामला आने वाले समय में कानून और समाज दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगा, जहां यह दिखेगा कि झूठी कहानियां गढ़कर सच को छिपाना कितना भारी पड़ सकता है और इसके क्या गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

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