जंगल गई थी चूल्हे की लकड़ी लेने… मौत बनकर झपटा टाइगर! कॉर्बेट में महिला की दर्दनाक हत्या से गांव में मचा कोहराम



कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की ढेला रेंज में लकड़ी लेने गई महिला को टाइगर ने मार डाला, गांव में दहशत, वन विभाग पर लापरवाही के आरोप।


जंगल और मजबूरी के बीच मौत की एंट्री

उत्तराखंड के रामनगर में स्थित विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने इंसान और जंगल के रिश्ते की सबसे भयावह सच्चाई को फिर से उजागर कर दिया है। यहां ढेला रेंज के अंतर्गत आने वाले सांवल्दे गांव में एक महिला की टाइगर हमले में मौत हो गई। यह कोई रोमांचक जंगल सफारी की कहानी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की मजबूरी से उपजी एक त्रासदी है। महिला चूल्हे के लिए लकड़ी लेने जंगल गई थी, लेकिन लौटकर नहीं आई। जंगल से लौटने के बजाय वह जंगल का ही हिस्सा बन गई।

मृतका की पहचान और सुबह की वो आखिरी घड़ी

मृतक महिला की पहचान सुखिया देवी के रूप में हुई है। ग्रामीणों के मुताबिक, सुखिया देवी रोज की तरह सुबह जंगल की ओर गई थीं। यह कोई असामान्य बात नहीं थी, क्योंकि गांव की बड़ी आबादी आज भी ईंधन, चारा और लकड़ी के लिए जंगल पर निर्भर है। सुबह का समय अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, लेकिन उसी समय जंगल में पहले से मौजूद टाइगर ने घात लगाकर हमला कर दिया। चंद सेकंड में पूरा खेल खत्म हो गया और महिला को संभलने तक का मौका नहीं मिला।

टाइगर का हमला और मौके पर ही मौत

बताया जा रहा है कि टाइगर ने अचानक पीछे से हमला किया। हमले की तीव्रता इतनी अधिक थी कि महिला की मौके पर ही मौत हो गई। जब काफी देर तक सुखिया देवी घर नहीं लौटीं, तो परिजन और ग्रामीण उनकी तलाश में जंगल की ओर गए। जंगल के भीतर जो दृश्य मिला, उसने सभी को सन्न कर दिया। महिला का शव टाइगर के हमले के निशानों के साथ पड़ा मिला। यह साफ था कि यह कोई सामान्य दुर्घटना नहीं, बल्कि सीधा और घातक वन्यजीव हमला था।

गांव में दहशत, गुस्सा और आंसू

घटना की खबर फैलते ही पूरे सांवल्दे गांव में कोहराम मच गया। एक ओर परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है, वहीं दूसरी ओर गांव में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब टाइगर गांव के आसपास सक्रिय दिखा हो। पिछले कुछ समय से जंगल से सटे इलाकों में टाइगर की मूवमेंट लगातार देखी जा रही थी, लेकिन इसके बावजूद ठोस सुरक्षा इंतजाम नहीं किए गए।

वन विभाग पर गंभीर आरोप

ग्रामीणों ने वन विभाग पर सीधी लापरवाही के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बार-बार टाइगर की मौजूदगी की सूचना देने के बावजूद न तो गश्त बढ़ाई गई और न ही गांव के आसपास कोई स्थायी सुरक्षा व्यवस्था की गई। लोगों का आरोप है कि वन विभाग सिर्फ घटना के बाद हरकत में आता है, लेकिन पहले से चेतावनी के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाता। यही लापरवाही आज एक महिला की जान ले चुकी है।

जंगल पर निर्भर गांवों की कड़वी सच्चाई

सांवले जैसे गांवों की हकीकत यह है कि यहां रहने वाले लोग आज भी पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं से नहीं जुड़े हैं। गैस सिलेंडर, वैकल्पिक ईंधन और रोजगार के साधन हर घर तक नहीं पहुंचे हैं। ऐसे में लकड़ी बीनना कोई शौक नहीं, बल्कि मजबूरी है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर जंगल में जाना बंद कर दिया जाए, तो चूल्हा कैसे जलेगा और परिवार कैसे चलेगा। लेकिन जंगल में कदम रखते ही मौत का खतरा मंडराने लगता है।

घटना के बाद प्रशासन की हलचल

घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम, पुलिस प्रशासन और कॉर्बेट प्रशासन मौके पर पहुंचा। काफी मशक्कत के बाद महिला के शव को जंगल से बाहर निकाला गया और पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। इलाके में अतिरिक्त वन कर्मियों की तैनाती कर दी गई है और गश्त बढ़ा दी गई है। गांव में मुनादी कराकर लोगों से जंगल में अकेले न जाने की अपील की जा रही है।

मुआवजे की मांग और परिवार का भविष्य

ग्रामीणों और परिजनों की मांग है कि पीड़ित परिवार को तत्काल उचित मुआवजा दिया जाए। सुखिया देवी परिवार की अहम सदस्य थीं और उनकी मौत से परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित हुई है। गांव वालों का कहना है कि सिर्फ मुआवजा ही नहीं, बल्कि स्थायी समाधान जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी और घर का चूल्हा इस तरह न बुझे।

मानव और वन्यजीव संघर्ष का बढ़ता खतरा

यह घटना एक बार फिर मानव और वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को सामने लाती है। जैसे-जैसे जंगल सिमटते जा रहे हैं और इंसानी बस्तियां जंगल की सीमाओं तक फैल रही हैं, वैसे-वैसे ऐसे टकराव बढ़ रहे हैं। कॉर्बेट जैसे संरक्षित क्षेत्र में टाइगर की संख्या बढ़ना संरक्षण की सफलता मानी जाती है, लेकिन इसके साथ ही आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही बड़ी चुनौती बन गई है।

टाइगर की मूवमेंट पर निगरानी का दावा

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि टाइगर की मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है। कैमरा ट्रैप, गश्ती दल और स्थानीय सूचनाओं के जरिए स्थिति पर नियंत्रण की कोशिश की जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों, इसके लिए रणनीति बनाई जा रही है और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू किए जाएंगे।

सवाल जो अब भी अनुत्तरित हैं

इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या जंगल से सटे गांवों के लिए अलग सुरक्षा नीति होनी चाहिए। क्या वैकल्पिक ईंधन और रोजगार की व्यवस्था तेज नहीं की जानी चाहिए। क्या हर घटना के बाद आश्वासन देने से आगे भी कुछ होगा। फिलहाल इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं, लेकिन सांवल्दे गांव की एक महिला की मौत ने इन सवालों को और भी तेज आवाज दे दी है।

डर के साये में गांव की अगली सुबह

घटना के बाद गांव की अगली सुबह पहले जैसी नहीं थी। जंगल की ओर जाने वाली पगडंडियां सूनी थीं, लेकिन चूल्हों की चिंता हर घर में थी। डर और जरूरत के बीच फंसे ग्रामीण आज भी उसी दुविधा में हैं। कॉर्बेट के जंगल में गूंजती टाइगर की दहाड़ अब सिर्फ रोमांच नहीं, बल्कि मौत की आहट बन चुकी है।

यह घटना न सिर्फ एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि सिस्टम, जंगल और इंसान के बीच संतुलन की असफलता की कहानी भी है, जिसकी कीमत एक गरीब महिला ने अपनी जान देकर चुकाई है।

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